टीकमगढ़//नगर कि सर्वाधिक सक्रिय साहित्यिक संस्था म.प्र. लेखक संघ जिला इकाई टीकमगढ़ की ने बुन्देलखण्ड केशरी महाराजा छत्रसाल के जन्म स्थान मोर पहाडी पर छत्रसाल जयंती पर भव्य कवि सम्मेलन का आयोजन किया। सर्वप्रथम माँ सरस्वती का पूजन अर्चन कर वंदना की तत्पश्चात सभी ने महाराज छत्रसाल के चित्र पर पुष्प अर्पित किये। इतिहासकार रामगोपाल रैकवार ने बताया कि महाराज के बारे में बच्चों को जानकारी हो इसलिए नए पाठ्यक्रम में कुछ कक्षाओं के महाराज छत्रसाल के के बारे में पढ़ाया जाएँगा। हम लोग मोर पहाडी पर जाकर वहीं पर हर साल महाराजा छत्रसाल जन्म दिवस को ‘बुन्देलखंड दिवस’ के रूप में मनाते आ रहे हैं।
इतिहासकार एवं लाइबे्ररियन विजय मेहरा ने बताया कि महाराज छत्रसाल श्री कृष्ण प्रणामी संप्रदाय का प्रचार एवं प्रसार किया। इस संप्रदाय के संस्थापक महामति प्राणनाथ थे जिनसे प्रभावित होकर महाराजा छत्रसाल उनके शिष्य बन गये थे।
ख्यातिप्राप्त साहित्यकार राजीव नामदेव ‘राना लिधौरी’ ने बताया कि उन्हें सन् 2021 में म.प्र.साहित्य अकादमी द्वारा इक्यावन हजार का ‘छत्रसाल पुरस्कार’ मिला था जो कि मेरे लिए बहुत गौरव की बात है। हम यहाँ हर साल म.प्र. लेखक संघ के बेनर तले छत्रसाल की जयंती पर एक कवि गोष्ठी उनके ही जन्म स्थान मोर पहाड़ी के यहाँ पर करते आ रहे। बुंदेली कवि प्रभुदयाल श्रीवास्तव ‘पीयूष’ ने कहा कि- महाराज छत्रसाल इतने वीर थे कि उन्होंने 53 युद्ध लड़े और एक भी युद्ध नहीं हारे सभी में विजय हासिल। युवा कवि कमलेश सेन ने कहा कि महाराजा छत्रसाल का जन्म 17 जून को यही मोर पहाड़ी में हुआ था। हम बहुत सौभाग्यशाली के कि इसी माटी में हमने जन्म लिया है।
राना लिधौरी ने बताया कि यहाँ के स्थानीय लोगों एवं टीकमगढ़ जिले के कवि साहित्यकारों ने शासन एवं जन प्रतिनिशियों से यह माँग कि है कि महाराज छत्रसाल के जन्म स्थान मोर पहाड़ी पर महाराज छत्रसाल की एक मूर्ति लगायी जावे तथा इस परिक्षेत्र में पौधारोपण कर यहाँ का सुंदर उद्यान बनाया जाये।
वरिष्ठ बुंदेली कवि प्रभुदयाल श्रीवास्तव कविता सुनायी-
जेठ मास की तीज तिथ, शुक्ल पक्ष भृगु वार। सत्रह सो छै विक्रमी, भुंसारे के पार।
नुना महेबा के लिंगा,मोर पारिया ठौर। जां जनमें बुंदेल श्री, छत्रसाल सिरमौर।।
छत्रसाल पुरस्कार प्राप्त प्रख्यात कवि राजीव नामदेव ‘राना लिधौरी‘ ने महाराजा छत्रसाल की शान के दोहे पढ़े-छत्रसाल के अश्व की, मुड़ती जहाँ लगाम, जीत वहीं ‘राना’सदा,सुनते कथा तमाम।।
छत्रसाल राजा हुए बुदेला थे वीर,बरछी जिनकी तेज थी ‘राना’ ख्ुाद शमशीर।।
इतिहासकार व कवि रामगोपाल रैकवार ने कविता सुनायी-वीर भूम बुन्देल है, जा हीरन की खान।
छत्रसाल कौ छत्र है, सूरज कोटि समान।।
कवि विजय मेहरा ने सुनाया- छत्रसाल महाराज बिजली सी तलवार। उनके आगे घुटने टेके सब सरदार।।
कमलेश सेन ने सुनाया- बुंदेली माटी की सबने शान मानी है।
छत्रसाल से छत्रपति की हो गई अमर कहानी।
इनके अलावा लक्षमण सिंह(मोर पहाड़ी), राघवेन्द्र सिंह राठौर (पचैर), राजेन्द्र सिंह बुन्देला (प्रधान लारौन), रविन्द्र सिंह धंधेरे (महेबा),राजा बुन्देला (पड़रा), हरेन्द्रंिसह राठौर (महेबा),चरण ंिसंह बुन्देला (पड़रा),छत्रपाल सिंह बुन्देला(महेबा), खुमान सिंह, सहित वहाँ बड़ी संख्या में लोगों ने अपनी उपस्थिति देकर महाराज छत्रसाल को याद किया। इस अवसर पर सभी कवियों का सम्मान किया गया।
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