वर्दी का रौब, मूंछों पर ताव… अब यह ASI गिरफ्तार: जासूसी और ब्लैकमेलिंग के खेल का भोपाल ATS ने किया भंडाफोड़ I
भोपाल/इंदौर: खाकी की आड़ में गैरकानूनी धंधा करने वाले एक रसूखदार पुलिसकर्मी का चेहरा अब बेनकाब हो चुका है। क्राइम ब्रांच इंदौर में पदस्थ एएसआई (ASI) रामपाल, जो अपनी मूंछों के ताव और वर्दी के रौब के लिए जाना जाता था, अब सलाखों के पीछे है। मध्य प्रदेश आतंकवाद विरोधी दस्ते (ATS) ने उसे अवैध रूप से डेटा बेचने और ब्लैकमेलिंग के गंभीर आरोपों में गिरफ्तार किया है।
प्राइवेट जासूसों को बेचता था सरकारी डेटा
जांच में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि रामपाल पुलिस विभाग के संसाधनों का दुरुपयोग कर आम लोगों की निजी कॉल डिटेल (CDR) और लोकेशन निकालता था। वह इस गोपनीय जानकारी को प्राइवेट जासूसी एजेंसियों को बेच देता था। इसके बाद इन जानकारियों का इस्तेमाल लोगों को डराने-धमकाने और ब्लैकमेल करने के लिए किया जाता था।
जासूसी की आड़ में अवैध कारोबार
ATS ने तीन दिन पहले रामपाल को हिरासत में लिया था, जिसके बाद लंबी पूछताछ में कड़ियां जुड़ती गईं। रामपाल का सीधा कनेक्शन ‘इंदौर डिटेक्टिव सर्विस’ के संचालक मुकेश तोमर से पाया गया है। आरोप है कि मुकेश तोमर जासूसी एजेंसी की आड़ में लोगों की निजी जानकारी का अवैध कारोबार चला रहा था। रामपाल उसे डेटा मुहैया कराता था और बदले में मोटी रकम वसूलता था।
ATS की बड़ी कार्रवाई
ATS की इस कार्रवाई ने पुलिस महकमे में हड़कंप मचा दिया है। विभाग अब इस बात की भी जांच कर रहा है कि इस नेटवर्क में और कितने लोग शामिल हैं और अब तक कितने नागरिकों की गोपनीयता से समझौता किया गया है। वर्दी पहनकर अपराध करने वाले इस अधिकारी की गिरफ्तारी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कानून से ऊपर कोई नहीं है।
कुणाल की कलम: जब रक्षक ही बन जाए भक्षक
आज की बड़ी खबर ने न केवल पुलिस विभाग को शर्मसार किया है, बल्कि आम नागरिक के विश्वास पर भी गहरी चोट की है। इंदौर क्राइम ब्रांच के एएसआई रामपाल की गिरफ्तारी यह सोचने पर मजबूर करती है कि जिस वर्दी को हम अपनी सुरक्षा का प्रतीक मानते हैं, उसी की आड़ में निजी जानकारी का व्यापार कैसे संभव हुआ?
निजता पर हमला और पद का दुरुपयोग एक पुलिस अधिकारी का काम अपराधी को पकड़ना है, न कि अपराधी के साथ मिलकर आम जनता की कॉल डिटेल और लोकेशन का सौदा करना। ‘इंदौर डिटेक्टिव सर्विस’ जैसे निजी संस्थानों को गोपनीय डेटा बेचना और फिर ब्लैकमेलिंग का खेल खेलना, पेशेवर अपराध की पराकाष्ठा है। यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि नागरिकों की निजता (Privacy) पर एक सीधा और खतरनाक हमला है।
सावधान रहने की ज़रूरत यह घटना हमें याद दिलाती है कि डिजिटल दौर में हमारी निजी जानकारी कितनी संवेदनशील है। अगर रक्षक ही जासूसों के साथ साठगांठ करने लगें, तो न्याय की उम्मीद किससे की जाए? हालांकि, भोपाल एटीएस की इस कार्रवाई ने यह साफ कर दिया है कि खाकी के पीछे छिपे गुनहगारों के लिए भी कानून के हाथ बहुत लंबे हैं।
निष्कर्ष वर्दी का रौब और मूंछों का ताव तभी तक शोभा देता है, जब तक वह समाज की सेवा में हो। जब वही रौब ब्लैकमेलिंग का हथियार बन जाए, तो उसका अंजाम जेल की कालकोठरी ही होता है। प्रशासन को चाहिए कि ऐसे ‘काली भेड़ों’ को चिन्हित कर सख्त से सख्त सजा दे, ताकि भविष्य में कोई दूसरा अपनी शक्ति का ऐसा सौदा न कर सके।
— पत्रकार कुणाल पासवान

