टीकमगढ़। शहर की प्रतिष्ठित उर्दू साहित्यिक संस्था बज़्में अदब की 275वीं माहाना नशिस्त का आयोजन शायर शकील खान के दौलत कदे पर किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ शायर मोहम्मद अखलाक कादरी ने की। नशिस्त में इस माह के लिए निर्धारित मिसरा-ए-तरह “मगर इज़हार वो करता नहीं है” पर शायरों ने अपनी-अपनी ग़ज़लें और अशआर प्रस्तुत कर अदबी महफिल को यादगार बना दिया।
बज़्में अदब के मीडिया प्रभारी राजीव नामदेव ‘राना लिधौरी’ द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार कार्यक्रम में स्थानीय शायरों ने प्रेम, वफ़ा, सामाजिक सरोकार और मानवीय भावनाओं पर आधारित उत्कृष्ट रचनाएं प्रस्तुत कीं।
शायरों ने पेश किए दिल को छू लेने वाले कलाम
वफ़ा शैंदा ने पढ़ा— “ये कैसा बागवां आया चमन में,
गुलों से प्यार वो करता नहीं है।”
इकबाल फ़ज़ा ने कहा— “बहादुर है मगर दुश्मन को अपने,
तहे-तलवार वो करता नहीं है।”
अखलाक कादरी ने अपना शेर सुनाया— “किसी को भी कभी मेरे अलावा,
गले का हार वो करता नहीं है।”
शकील खान ने पढ़ा— “निगाहें चार वो करता नहीं है,
किसी से प्यार वो करता नहीं है।”
अनवर साहिल ने शेर पेश किया— “मुझे दुश्मन की ये खूबी पसंद है,
कि छुपकर वार वो करता नहीं है।”
सलीम खान ने कहा— “जिसे आता नहीं तूफां से लड़ना,
समंदर पार वो करता नहीं है।”
पूरन चंद्र गुप्ता ने सुनाया— “कभी इकरार वो करता नहीं है,
किसी से प्यार वो करता नहीं है।”
जाबिर गुल ने पढ़ा— “दिखाता है हमें सपने हजारों,
मगर साकार वो करता नहीं है।”
राजीव नामदेव ‘राना लिधौरी’ ने कहा— “ज़रूरत है मुझे भी ‘राना’ उसकी,
मदद पर यार वो करता नहीं है।”
वहीं कमलेश सेन ने अपने अशआर में कहा— “सब कुछ तो लुट गया मेरा दिल के बाज़ार में,
अब ज़िंदगी भी जी रहा, वो भी उधार में।”
खालिद बेग ने शेर सुनाया— “जो दौलतमंद होगा खानदानी,
दिखावा यार वो करता नहीं है।”
धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ समापन
कार्यक्रम का संचालन इकबाल फ़ज़ा ने किया, जबकि अंत में अध्यक्ष मोहम्मद अखलाक कादरी ने सभी शायरों, साहित्य प्रेमियों और उपस्थित जनों का आभार व्यक्त किया। अदबी माहौल और उम्दा शायरी के बीच आयोजित यह नशिस्त साहित्य प्रेमियों के लिए यादगार साबित हुई।

