नर्मदा पुरम/ प्रदीप गुप्ता/ जन आंदोलन का राष्ट्रीय समन्वय के अंतर्गत नर्मदा बचाओ अभियान से जुड़ी मेघा पाटकर ने एक प्रेस वार्ता कर कहा कि जल जंगल जमीन ही जीने का अधिकार है अगर आज ऐसे नहीं बचाया तो कल मानव जीवन का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। आज जिस तरह से बांध बन रहे हैं और नदियों का रूप बदला जा रहा है जिस वजह से नदियां सूखती जा रही हैं। आज हिमालय में जोशीमठ धसते हुए हमें चेतावनी दे रहे हैं कि अब सोचना जरूरी है कि इन संसाधनों की रक्षा और उपयोग कैसे करें और उन्हें कैसे बचाएं और विकसित करें। विकास की दौड़ में संसाधनों पर और उनके साथ जुड़े जीते समाज पर होते आधार सोचने के लिए मजबूर करते हैं। जहां पीढ़ियों से बसे समुदाय भुगतते हैं आजीविका से वंचित और विस्थापन वहां संघर्ष होता है संवैधानिक कानूनी और मानव अधिकार भी हासिल करने के लिए। कई कानूनों का अमल नहीं होता है तो संविधान और नागरिक तथा मानवीय अधिकार कुचला जाता है संसाधनों का विकास नहीं विनाश होता है और पीढियां पुराने समुदाय का विस्थापन। इसमें पूजी बाजार और पूंजीपतियों का निवेश तथा उन्हें प्राप्त निवेश तथा उन्हें प्राप्त अवकाश और अधिकार आज देश में चर्चा का विषय है और शासन ही नहीं समाज को भी अर्थव्यवस्था की स्थिति और उसके और सुरों की नकल लेना बेहद जरूरी है। संपूर्ण भारत से 10 राज्यों से वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता और आदिवासी किसान मजदूर मछुआरों के प्रतिनिधि आ रहे हैं। सम्मेलन की बात 2 अप्रैल की शाम 4:00 बजे कलेक्ट्रेट कार्यालय के सामने पीपल चौक पर एक आमसभा होगी, जिसमें सम्मेलन में विचार निर्णय आम जनता के समक्ष रखे जाएंगे। अवसर पर पर नर्मदा बचाओ अभियान की मेघा पाटेकर, गोपाल राठी, गीता मीणा उपस्थित रहे।
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