टीकमगढ़ । बुंदेलखंड के हजारों वर्ष प्राचीन अतिशय क्षेत्र बंधा जी में मुनि श्री 108 विनम्र सागर जी महाराज, निस्वार्थ सागर, निर्मद सागर, निसर्ग सागर, श्रवण सागर एवं छुल्लक 105 हीरक सागर जी महाराज का चातुर्मास चल रहा है। प्रतिदिन सैकड़ो भक्त बंधा जी पहुंचकर भगवान का अभिषेक एवं शांति धारा करके अपनी आत्मा का कल्याण कर रहे हैं। जैन समाज का सबसे बड़ा पर्व पर्यूषण भाद्र शुक्ल 4 मंगलवार से प्रारंभ हो चुका हैं। जैन समाज की महिलाएं पुरुष एवं बच्चे अपनी शक्ति अनुसार मंदिरों में पूजा, पाठ विधान,अभिषेक, शांतिधारा, उपवास एकासन आदि कर रहे हैं । नगर टीकमगढ़ की नंदीश्वर कॉलोनी निवासी प्रदीप जैन बम्होरी ने प्रेस को प्रेस विज्ञप्ति जारी करते हुए बताया कि बंधाजी में मंगलवार को 10 लक्षण पर्व के प्रथम दिन उत्तम क्षमा दिवस के अवसर पर प्रातः 06.45 बजे श्री जी का अभिषेक एवं शांति धारा संपन्न हुई 08 से आचार्य भगवन विद्यासागर जी महाराज की पूजन हुई। 08.30 बजे से मुनि श्री 108 निर्मद सागर जी महाराज के प्रवचन शुरू हुए मुनि श्री निर्मदसागर जी महाराज ने कहा कि आज आप सभी लोग बंधा जी में अजितनाथ भगवान के दरबार में 10 लक्षण पर्व मनाने आऐ हो, यह पर्व आपके जीवन में पुण्य की वृद्धि करेगा। आज उत्तम क्षमा धर्म का दिन है।संसार में प्रत्येक मानव प्राणी के लिए क्षमा रूपी शास्त्र इतना आवश्यक है कि जिनके पास यह क्षमा नहीं होती वह मनुष्य संसार में अपने इष्ट कार्य की सिद्धि नहीं कर सकता है। क्षमा यह आत्मा का धर्म है, इसलिए जो मानव अपना कल्याण चाहते हैं, उन्हें हमेशा इस भावना की रक्षा करनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि जब शरीर में एक छोटा सा घाव हो जाए वह घाव कव नासूर बन जाए पता ही नही चलता आचार्य श्री कहते हैं कि थोड़ा कर्ज समय से नहीं चुकाया तो बड़ा रूप धारण कर के हमारी जीवन की शांति को अशांति में बदल देता है। अगर जंगल में छोटे से तिनके में आग लगा दी जाए तो पूरे जंगल को खाक कर देता है। इसी प्रकार से थोड़ा सा क्रोध हमारे जीवन में अगर आ गया तो क्रोध हमारे जीवन को नाश करने वाला होता है। मुनि श्री ने कहा कि क्रोध हमारे चरित्र की सबसे बड़ी दुर्बलता है क्रोध ऐसा विकार है जो हमें निर्विकार नहीं होने देता है। क्रोध के रहते हमारा मन प्रसन्नता को प्राप्त नहीं हो पाता ।क्रोध मनुष्य अपने शत्रु पर करता है लेकिन वास्तव में क्रोध मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है क्रोध अपने आप में एक घातक बीमारी है इसको नियंत्रित करना मुश्किल हो जाता है धर्म साधना उपासना पर उसका मूल लक्ष्य अपने दुर्बलता पर विजय प्राप्त करना है। क्रोध रूपी जहर हमारे मन मस्तिष्क को परेशान कर देता है क्रोध की उत्पत्ति अविवेक से हुआ करती है और इसका अंत पश्चाताप पर होता है।
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