टीकमगढ़।”जहाँ चाह वहाँ राह” — यह कहावत उस समय सजीव हो उठी जब टीकमगढ़ की बेटियाँ 33वीं सेंट्रल इंडिया कराटे प्रतियोगिता में अपने दम पर पदक झटक लाईं। 21 से 22 जून 2025 तक भोपाल में आयोजित इस प्रतियोगिता में टीकमगढ़ जिले की टीम ने हिस्सा लिया, जिसमें आठ खिलाड़ियों ने पदक जीतकर जिले को गौरवान्वित किया।
इस प्रतियोगिता में अक्सा खान, रोजी बानो और आकांक्षा प्रजापति ने स्वर्ण पदक गोल्ड मेडल अपने नाम किए। वहीं तस्मिया खान, अवनी जैन, इकरा बानो, आकांक्षा रजक और काजल रैकवार ने कांस्य पदक ब्रोंज मेडल जीतकर जिले के खेल मानचित्र पर अपनी चमक बिखेरी।
खास बात – अक्सा और तस्मिया सगी बहनें
इस जीत में जो बात सबसे प्रेरणादायक रही, वह है — एक ही परिवार की दो बहनों की सफलता। अक्सा और तस्मिया खान, दोनों मास्टर नईम की बेटियाँ हैं। नईम खान खुद भी खेलों के पुरोधा रहे हैं — वे टीकमगढ़ जिले के टेबल टेनिस के ख्यातिप्राप्त खिलाड़ी रह चुके हैं और इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी स्तर तक भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं।
आज वही जुनून उन्होंने अपनी बेटियों को सौंपा। उन्होंने बेटियों को न सिर्फ खेल से जोड़ा, बल्कि उन्हें हर मोड़ पर प्रोत्साहित किया, कठिन समय में हौसला दिया, और एक पिता की भूमिका से बढ़कर कोच और मार्गदर्शक की भूमिका निभाई।
एक पिता का सपना — बेटियों को ओलंपिक में देखना
नईम खान का कहना है, मैंने अपने समय में जो ऊंचाई देखी, उससे आगे अपनी बेटियों को पहुंचते देखना चाहता हूँ। मेरा सपना है कि मेरी बेटियाँ एक दिन ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व करें। मैं उनके लिए तब तक लड़ता रहूंगा, जब तक वह सपना हकीकत न बन जाए।
टीकमगढ़ की बेटियाँ — अब सिर्फ घरेलू नाम नहीं, राष्ट्रीय पहचान
इन बेटियों की जीत टीकमगढ़ के लिए एक संदेश है — प्रतिभा गाँव, गली, मोहल्ले की चौखट तक सीमित नहीं होती, अगर उसे सही मार्गदर्शन और संसाधन मिले तो वह अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी झंडे गाड़ सकती है।
इस उपलब्धि पर जिला भर में उत्सव जैसा माहौल है। स्कूल, कोचिंग संस्थान, सामाजिक संस्थाएं, सभी ने दोनों बहनों और अन्य विजेताओं को बधाई दी है। सोशल मीडिया पर इनकी तस्वीरें और वीडियो वायरल हो रहे हैं। लोग इन्हें ‘टीकमगढ़ की गोल्डन गर्ल्स’ कहकर संबोधित कर रहे हैं।
एक जिले के लिए यह सिर्फ जीत नहीं, संदेश है
यह सिर्फ मेडल नहीं, यह एक मिशन है। बेटियों की मेहनत का परिणाम है। यह उन अभिभावकों के लिए भी प्रेरणा है जो बेटियों को खेलों या खुले मंच पर आगे लाने से झिझकते हैं।
कोचों, शिक्षकों और जिला प्रशासन से भी अपेक्षा
अब ज़रूरत है कि जिला प्रशासन, खेल अधिकारी, और निजी संस्थान ऐसे खिलाड़ियों को आर्थिक और तकनीकी सहयोग दें, ताकि ये प्रतिभाएँ राज्य और देश स्तर पर और ऊँचा उड़ान भर सकें।

