टीकमगढ़ । भारत वसुन्धरा की विन्ध्य भूमि बुन्देलखण्ड में स्थित लघु सम्मेद शिखर द्रोणगिरि नाम से विश्वविख्यात सिद्धभूमि यह चतुर्थ कालीनअत्यंत प्राचीन ऐतिहासिक धार्मिक स्थल गुरुदत्तादि महामुनिश्वरों की पवित्र निर्वाणस्थली,कल-कल बहती दो-दो नदियों की सुरम्य धाराओं के मध्य स्थित विशाल पर्वत द्रोणगिरि का मनमोहक वातावरण और यहां स्थित प्राचीन और विशाल मंदिरों का समूह दर्शनार्थियों को ऐसे आकर्षित करती है जैसे चुम्बक लोहे को आकर्षित करती है। पर्वत का नाम द्रोणगिरि है वास्तव में तपोभूमि की उपयुक्त रमणीयता को देखते हुए प्राचीन काल में यहाँ तपस्या के लिए आना अधिक संभव था और अनेक मुनियों का यहाँ से निर्वाण प्राप्त करना असंभव नहीं था। पर्वत के दायें और बायें बाजू से काठिन नदी और श्यामली नदियाँ सदा प्रवाहित रहती हैं। ऐसा प्रतीत होता है, मानों ये सदानीरा पार्वत्य सरिताएँ इस सिद्धक्षेत्र के चरणों को पखार रही हों। यहाँ का प्राकृतिक दृश्य अत्यन्त आकर्षक चारों वनौषधियों का बाहुल्य है। है। इस वन में हरिण, नीलगाय आदि वन्य पशु निर्भयतापूर्वक विचरण करते हैं। राजकीय आदेश—पर्वत क्षेत्र पर शिकार-निषेध विजावर नरेश राजा भानुप्रताप रियासतों के विलीनीकरण से पूर्व के समय से इस तीर्थ संबंधित फरमान, जो राज दरबार से जारी हुकम दरवार विजावर रियासत द्वारा दरख्वास्त 22मई सन् 1939 ईसवीय क्षेत्र द्रोणगिरि मौजा सेंधपा पर हुक्म हुआ इस फरमान द्वारा द्रोणगिरि पर्वत पर जैन समाज का पूरा अधिकार माना गया परम्परा के रूप में अब भी प्रचलित और मान्य है। इतिहास अत्यंत प्राचीन है सिद्ध भूमि चतुर्थ कालीन द्रोणगिरि – गुरुदत्तादि महामुनिश्वरों की पवित्र निर्वाणस्थली, प्राकृतिक निर्माण गुफा है 3 गज ऊँची,1 गज चौड़ी और 07-08 गज लम्बी गुफा के बाह्य भाग में गुरुदत्तादि मुनियों के चरण-चिन्ह हैं। गुफा में तपस्या करते हुए उन्हें मुक्ति प्राप्त हुई थी। गुफा के संबंध में विविध प्रकार की कवदन्तियाँ प्रचलित कि सेंधपा गाँव का रहने वाला एक भील प्रतिदिन इस गुफा में जाया करता था और वहाँ से कमल का एक सुन्दर फूल लाया करता था एक दूसरी किवदन्ती है कि गुफा 14-15 मील दूर भीमकुण्ड तक गयी है। पर्वत की तलहटी से एक मील आगे जाने पर श्यामली नदी का भराव है, जिसे कुडी कहते हैं। वहाँ दो जलकुण्ड पास-पास में बने हुए हैं, जिनमें एक शीतल जल का है और दूसरा उष्ण जल का। सम्मेदशिखर के समान पर्वत पर अनेकअर्द्ध शतक जिनालयों की श्रृंखला से सुशोभित पावन तीर्थ जिनालय जहां चन्द्रप्रभ टोंक, आदिनाथ टोंक, शान्ति नाथ टोंक हैं। जहां पार्श्वनाथ टोंक जिनालयों मे यहाँ मुख्य रूप से पाषाण की कृष्णवर्ण,पद्मासन विक्रम संवत् 1918 इस प्रतिमा के ऊपर सहस्र फणा वाले भगवान पार्श्वनाथ सुशोभित हैं,
पार्श्वनाथ-मूँगिया वर्ण, वि.सं.1907 मे प्रतिष्ठित, सप्त फणवाली ,पार्श्वनाथ -श्वेतवर्ण, पद्मासन, वि.सं.1545 में प्रतिष्ठित, पार्श्वनाथ – श्वेतवर्ण,मूर्ति पर फण नहीं सं.1548 में प्रतिष्ठित ,पर्वत पर प्राचीन भगवान आदिनाथ सातिशय प्रतिमा संवत् 1549 की विराजमान है।अतिशकारी त्रिकाल चौबीसी- भव्य मनोहारी सास-बहू मन्दिर वर्ष 2016। मानस्तम्भ- पुरातत्व की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।मन्दिर में स्थापित चन्देल कालीन चोटी पर 96 मूति जिनकी ऊँचाई प्रत्येक की 3 इंच है,नीचे मन्दिर के समान चारों ओर पूर्व में पद्मावती ,दक्षिण में खडगासन चक्रेश्वरी- पश्चिम में नग्रदेव मुकुट धारण किये हुये पुरातत्त्व की विपुल सामग्री है ।
पर्वत पर जाने के लिए 242 पक्की सीढ़ियाँ बनी हुई हैं ।
चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांति सागरजी महाराज ने वर्ष 1929 में ध्यान और तपस्या के लिए चुना था जब वे यहां आए थे। उस रात शेर उनके निवास स्थान गुफा में आया, जब उसने तपस्वी संत को ध्यान में देखा, तो वह आचार्य को नुकसान पहुँचाए बिना शांति से वहाँ रहा और अगली सुबह जंगल में चला गया। इस घटना का वर्णन “चारित्र चक्रवर्ती” पुस्तक में किया गया है। जहां वात्सल्य दिवाकर परमपूज्य आचार्य श्री विमल सागर जी महामुनिराज की अविस्मरणीय यात्राऐ रही । परम पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी संघ में सभी ऐलक क्षुल्लक ही थे।आचार्य श्री द्वारा श्रमण मुनि समयसागर जी को प्रथम निर्ग्रन्थ मुनि दीक्षा 08 मार्च 1980, शनिवार, चैत्र कृष्ण षष्ठी दी थी इस दीक्षा का वर्णन प्रत्यक्षदर्शी पूज्य मुनि क्षमासागर जी महाराज ने आत्मान्वेषी कृति में भी किया है । परमपूज्य गणाचार्य श्री 108 विराग सागर जी महामुनिराज की आचार्य पद पदारोहण स्थली । एवं ऐतिहासिक दीक्षा ऐ भी हुई, सानिध्य में जिनबिम्ब पंचकल्याणक भक्तामर मानस्तम्भ प्रतिष्ठाऐ ।सारस्वताचार्य श्री देवनन्दी जी महाराज का चर्तुमास 1999 , साथ ही आचार्य विशुद्ध सागर जी, सहित अनेकों आचार्य महाश्रमण आगमन
परमपूज्य गणनीय आर्यिका श्री ज्ञानमति माता जी द्धारा सासंघ भावना वंदना । चौबीसी जिनालय- 1967 में कार्य प्रारम्भ हुआ चौबीस जिनालय का भव्य भवन 160 फुट लम्बा और 85 फुट चौड़ा है, चौबीसी के निर्माण में जहां प्रान्तीय जैन समाज ने उत्साह प्रगट किया। वहीं आदरणीया ब्र० रामाबाई जी यथेष्ठ सहयोग श्री गोरेलाल जी शास्त्री द्रोणगिरि का अमूल्य सहयोग भी भुलाया नहीं जा सकता ,बुन्देलखण्ड द्रोणगिरि जी में सर्वप्रथम परमपूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के सानिध्य चौबीसी जिनबिम्ब पंचकल्याणक गजरथ महोत्सव 2 मार्च 1977 में हुआ। उदासीन आश्रम – सन् 1955 में सम्पन्न
गजरथ महोत्सव के समय आश्रम की स्थापना की गई थी, पूज्यपाद क्षु.चिदानन्द महाराज का विशेष आशीर्वाद रहा है,पूर्व में प्राचीन धर्मशाला में संचालित था, बाबू बालचन्द्र मलैया की सलाह से ट्रस्ट की भूमि पर आश्रम भवन का निर्माण कराया गया, जहां आश्रम में अनेक व्रती धर्माराधन करते हैं। श्री गु. दि. जैन संस्कृत विद्यालय – वि.सं. 1685 में स्थापना की श्री सिं. कुन्दनलाल, ब्रन्दावन डेवडिया, एवं प्रान्तीय समाज के आर्थिक सहयोग से विद्यालय ने सैकड़ों छात्रों को आत्मनिर्भर बनाया । पूज्य गणेश प्रसाद वर्णी की तपस्थली, वर्णीजी ने कभी इसे लघु सम्मेद शिखर कहा था। प्रबंधन शिक्षण संस्थान- कपूर चन्द्र घुवारा का विषेश सोच एवं श्री भागचंद पीली दुकान के प्रयासों से संचालित हुआ। पवर्त पर वाहन से आने जाने हेतु विषेश प्रयासों में श्री कपूर चन्द्र घुवारा पूर्व विधायक अध्यक्ष के 28 बर्षीय कार्यकाल में सुविधाजनक पवर्त हेतु डामरीकरण सहित निर्माण करना भी एक अतिशय ही मानते हैं। श्री देवनन्दी ओषधि केन्द्र एवं वृहद धर्मशालाएँ बनी हुई हैं। द्रोण प्रान्तीय नवयुवक सेवासंघ 1961 में द्रोणगिरि में इसकी स्थापना की थी तब से बराबर यह समाज सेवा का कार्य कर रहा है।पर्वत की तलहटी मेें प्राचीन जैन मन्दिर है, वहीं बँगला भवन कहते हैं अब भी खड़ा है । आचार्य श्री देवनंदी में 28 बाई 110 आकार का हॉल है श्री विराग सागर धर्मशाला में 01 हॉल, 03 कमरे, मीटिंग हॉल 02 और कमरे 07 भी हैं। यात्री निवास भव्यता से युक्त चौबीसी परिसर में धर्मशाला से दक्षिण की ओर दो फर्लांग दूरी पर पर्वत है , बड़ा मलहरा में स्थित क्षेत्रीय भवन की व्यवस्थाऐ साथ ही क्षेत्र पर अन्य जो भी संस्थाएँ हैं, उनका भी संचालन ट्रस्ट प्रबंध महासमिति करती है, मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले मे कानपुर-सागर रोड पर बड़ामलहरा नगर के द्रोणगिरि द्वार से सात कि.मी.दुरी पर द्रोणगिरि तलहटी में सेंधपा गाँव है। प्रेस को यह तमाम जानकारी भूमिपुत्र पवन घुवारा ने व्हाट्सएप के माध्यम से प्रेस विज्ञप्ति जारी करते हुए दी है।
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