टीकमगढ़।इस्लाम धर्म का प्रमुख त्योहार चेहल्लुम शहीद ए कर्बला की याद में हर वर्ष मनाया जाता है है मुस्लिम समाज में चेहल्लुम को अरबीन भी कहा जाता है इस्लाम में मान्यता है कि दसवीं मुहर्रम को इमाम हुसैन और कर्बला के शहीदों की शहादत के 40वें दिन मनाया जाता है इमाम हुसैन हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहो ताला अलेही वसल्लम के नवासे थे और उन्होंने यजीद की बुराईयों के खिलाफजंग लड़ी थी। एक ओर जहां 14 अगस्त को यह त्यौहार विश्वभर के इस्लामिक देशों में मनाया गया है और दुनिया के कुछ अन्य हिस्सों में शुक्रवार 15 अगस्त को चेहल्लुम का त्योहार मनाया गया। मुस्लिम समुदाय के लोग चेहल्लुम को शहादत के रूप में हर साल मनाते हैं। जिसके तहत यह त्यौहार टीकमगढ़ में भी मनाया गया। त्याग और बलिदान का भी प्रतीक है यह त्यौहार ? मान्यता है कि चेहल्लुम केवल शोक का त्यौहार ही नहीं है बल्कि यह साहस त्याग और बलिदान का भी प्रतीक है यह त्यौहार मुसलमानों को इमाम हुसैन के जीवन और शिक्षाओं से प्रेरणा लेने और एक बेहतर इंसान बनने का संदेश देता है। यह त्यौहार इमाम हुसैन और कर्बला के शहीदों को श्रद्धांजलि देने का अवसर है जिन्होंने न्याय समानता और सत्य के लिए अपना बलिदान दिया था। यह त्यौहार त्याग और बलिदान की भावना को याद करने का भी समय है। चेहल्लुम का त्यौहार सब्र सहनशीलता न्याय और समानता जैसे इस्लामी मूल्यों को मजबूत करने का अवसर प्रदान करता है। इसलिए इस दिन शोक सभाएं आयोजित की जाती हैं जिनमें इमाम हुसैन और कर्बला के शहीदों की शहादत के बारे में नौहे और मरसिए पढ़े जाते हैं शोक जुलूस निकाले जाते हैं जिनमें लोग सीनाजोई करते हैं मातम करते हैं और कर्बला की लड़ाई का नाट्य. मंचन करते हैं इसके अलावा गरीबों और जरूरतमंदों को भोजन और अन्य सहायता दी जाती है। चेहल्लुम पर निकले प्रमुख मार्गों से ताजिया क्षेत्र भर से जुटे मुस्लिम भाई नगर में हजरत इमाम हुसैन की शहादत में मनाया जाने वाला मातमी पर्व मोहर्रम के ठीक 40 दिन बाद चेहल्लुम
के मौके पर ताजिया निकाले गए। यह ताजिया नगर के विभिन्न मार्गों से निकलते हुए बड़ी मस्जिद पर एकत्रित हुए। इसके बाद पूरे नगर से निकलते हुए मुख्य मार्गों से होते हुए किले की मैदान में पहुंचे।
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