


नर्मदापुरम / नदी मित्र इकाई ग्वालियर द्वारा नाट्यकला विभाग, राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय में आयोजित नदी संवाद कार्यक्रम में मध्य प्रदेश की नदियों के संरक्षण तथा पर गहन चर्चा हुई। मुख्य वक्ता नदी मित्र प्रो. ओम प्रकाश भारती ने कहा कि मध्य प्रदेश नदियों का मायका कहा जाता है, यहां चार सौ से अधिक छोटी बड़ी नदियां हैं। चंबल इस क्षेत्र की जीवनरेखा हैं। कई शहरों से गुजरने के कारण सीवेज और औद्योगिक कचरे का पानी नर्मदा में मिल रहा है। चंबल नदी नदी मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश से होकर बहती है, और इसका अपवाह क्षेत्र करीब 19,500 वर्ग किलोमीटर है। आज यह नदी गंभीर पर्यावरणीय संकट का सामना कर रही है, जिसमें जल स्तर में कमी, प्रदूषण और जैव विविधता का ह्रास प्रमुख हैं। राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य के कारण यह घड़ियाल, गंगा डॉल्फिन और दुर्लभ कछुओं का प्राकृतिक आवास है, लेकिन मानवीय गतिविधियों से ये प्रजातियाँ खतरे में हैं। चंबल की सहायक नदियों में से कई, जैसे शिप्रा, कूनो और सिंध, सूखने की कगार पर हैं। बरनार, बंजर, शेर, शक्कर, दूधी, तवा नदी, गंजाल, छोटी तवा, कुन्दी, देव, गोई, गार,हिरन, तेंदुनी, बरना, चन्द्रकेशर, चोरल, कानर, मान, ऊटी तथा हथनी नर्मदा की सहायक नदियां ओमनी, सिंगरी, पलकमती, देनवा, गंजाल, दूधी, तवा, हिरन आदि नदियां सूख रही हैं, जिससे नर्मदा का प्रवाह कमजोर हो रहा है। बुंदेलखंड की गंगा कहे जाने वाली बेतवा नदी पूर्णतः प्रदूषित हो चुकी है। उद्गम स्थल झिरी गांव में इसका स्रोत सूख चुका है। धार्मिक और सांस्कृतिक महत्त्व की नदी क्षिप्रा का जल मानव उपयोगी नहीं रह गया है। चंबल की सहायक नदी बनास, काली सिंध, पार्वती, कूनो जैसी सहायक नदियां सूख रही हैं, जिससे इसका का प्रवाह सिकुड़ रहा है।अजनार, गाढ़ गंगा, काली सिंध, नेवज, पार्वती, धसान, केन, सिंध, कूनो, स्वर्ण, तमस आदि नदियां पूरी तरह सूख चुकी हैं। ये नदियाँ कृषि, पेयजल और उद्योगों के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन औद्योगिक अपशिष्ट, अनुपचारित सीवेज, अवैध रेत खनन, अत्यधिक जल दोहन और वनों की कटाई जैसे कारणों से संकटग्रस्त हैं। प्रो. भारती ने बताया कि खेतों में डाले जाने वाले रसायन बारिश के साथ नदियों में मिलकर जल को जहरीला बना रहे हैं। अनियमित मानसून और कम वर्षा के कारण नदियाँ गर्मियों में सूख रही हैं। बांधों ने नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को बाधित किया है, जिससे जैव विविधता, विशेषकर मछलियाँ और जलीय जीव, खतरे में हैं। नदियों के संरक्षण के लिए प्रो. भारती ने प्रभावी उपाय सुझाए, जिनमें औद्योगिक और घरेलू अपशिष्ट के लिए उन्नत सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की स्थापना, अवैध रेत खनन पर सख्त कानूनी कार्रवाई, वर्षा जल संचयन, वनीकरण और टिकाऊ जल प्रबंधन नीतियों को बढ़ावा देना शामिल है। उन्होंने स्थानीय समुदायों को नदी संरक्षण में शामिल करने और पर्यावरण शिक्षा के प्रसार पर जोर दिया। नदी मित्र ने मध्य प्रदेश की नदियों के सांस्कृतिक महत्व को संरक्षित करने के लिए एक विशेष संकल्प लिया। इसके तहत नदियों से जुड़े मिथक, कहानियाँ, गीत, ऐतिहासिक विवरण और मौखिक परंपराओं का संकलन किया जाएगा। नदियों के किनारे बसे समुदायों, तीर्थस्थलों, सांस्कृतिक स्थलों, पर्वों और अनुष्ठानों का अध्ययन होगा। भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS) के माध्यम से नदियों का डेटाबेस, डिजिटल आर्काइव और संग्रहालय स्थापित करने की योजना है।
*नदियों की ज़मीन हड़पने वालों के विरुद्ध कठोर कानून बने।*
नदी मित्र भारती ने कहा छोटी नदियां अतिक्रमण के कारण लुप्त हो रही हैं। छोटी नदियों के प्रवाह क्षेत्र की अधिकांश ज़मीन किसान और रैयतों की है। उच्च मार्ग (हाइवे), रेलवे, उद्योग के लिए ज़मीन अधिग्रहण करने की नीति, योजना तथा अभ्यास है आपके पास, तो इन छोटी नदियों के लिए क्यों नहीं? छोटी नदियां बड़ी नदियों का आधार है। वे भी संस्कृति के प्रवाह हैं, जीवनदायिनी है। छोटे लोगों की उपेक्षा तो करते रहिए, मानव है संघर्ष उनकी नियति है। नदियां तो निर्जीव है, चल फिर तो सकती है, लेकिन कानूनी लड़ाई नहीं लड़ सकती, कोर्ट कचहरी नहीं जा सकती। उसके लिए लड़ना तो समाज को ही होगा। भारत में नदियों से संबंधित कानून मुख्य रूप से जल विवाद निपटान, प्रदूषण नियंत्रण, और संरक्षण पर केंद्रित हैं। अंतरराज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 और नदी बोर्ड अधिनियम, 1956 प्रमुख हैं, लेकिन उनकी प्रभावशीलता सीमित रही है। नदियों के संरक्षण और प्रबंधन के लिए एक एकीकृत “नदी अधिनियम” की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
नदी मित्र ने सरकार, स्थानीय समुदायों और पर्यावरण संगठनों से मध्य प्रदेश की नदियों के संरक्षण के लिए समन्वित प्रयास करने का आह्वान किया। नर्मदा, क्षिप्रा, बेतवा, चंबल और कान्ह जैसी नदियों के संरक्षण के लिए तत्काल और ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है। यदि समय रहते कार्य नहीं किया गया तो ये नदियां केवल इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह जाएगी। इसके लिए सरकार के साथ समाज को भी आगे आना होगा। कार्यक्रम का संयोजन स्थानीय रंगकर्मी रत्नेश साहू
ने किया । कार्य क्रम का संचालन डॉ. हिमांशु द्विवेदी तथा संयोजन डॉ. मनीष जैसल ने किया। इस अवसर पर आई टी एम विश्वविद्यालय की सहायक प्रोफेसर सोनाली सिंह, सुमित गौतम, युवराज सिंह यादव, नयन पार्थनी, रक्षित मालू, रितेश छारी, तेजस छारी, चिराग जैन, वंशिका चौहान, नैन्सी राजपूत, सोमी शर्मा मौजूद रहें। संगोष्ठी के बाद नदी मित्र के सदस्यों ने डबरा के समीप सिंध नदी स्थित ग्रामीणों से संवाद किया।

