टीकमगढ़ । तत्कालीन ओरछा रियासत में आजादी की अलख जगाने वाली अमर शहीद शेरे बुंदेलखंड श्री नारायण दास खरे का जन्म ललितपुर जिले के ग्राम दैलवारा में 14 फरवरी 1918 को हुआ था बचपन में ही उनके पिता श्री गनपत सिंह जी स्वर्ग सिधार गए थे । वे अपने बड़े भाई के संरक्षण में रहे पर कुछ दिन बाद उनकी भी मृत्यु हो गई। 13-14 वर्ष की आयु में अपने चाचा श्री पारीछत जी के पास टीकमगढ़ में रहने लगे। उनके चाचा जी ओरछा राज्य में कानूनगो थे। श्री नारायण दास खरे अपने छात्र जीवन से ही अपने आस-पास के गांव में राष्ट्रीयता की अलख जगाने वाले पर्चे बांटने का काम करने लगे थे। उन्होंने सन 1938 39 में बुंदेलखंड के अष्ट गढ़ी राज्य दुरबई,बिजना,बंका पहाड़ी, टोडी फतेहपुर आदि में राष्ट्रीयता का प्रचार प्रसार किया। यहां के जागीरदारों ने उन्हें अनेक कष्ट पहुंचाए ।ओरछा राज दरबार में उन्हें महेंद्र बाग में ओवर्शेअर बना दिया था पर खरे जी नौकरी छोड़ कर हैदराबाद आंदोलन में कूद पड़े जहां उन्हें छह माह की कैद में रहना पड़ा। जेल से छूटने के बाद भी झांसी के कार्यकर्ताओं के साथ राजनीतिक प्रचार में जुट गए। वे ठेठ बुंदेलखंडी भाषा में अपने भाषण दिया करते थे। 1939 में वे कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बने। वे सन 1942 में गठित ओरछा सेवा संघ के संस्थापक सदस्य थे। उन्होंने ओरछा हरिजन सेवक संघ के मंत्री के रूप में भी कार्य किया था। सन 1945 में राज्य की धारा सभा के पार्लियामेंट्री बोर्ड के अध्यक्ष बनाए गए थे ।उनके निर्देशन में ही ओरछा विद्यार्थी संघ का गठन हुआ था जो बाद में ओरछा विद्यार्थी कांग्रेस के नाम से संचालित हुई। 15 अगस्त 1947 को जब देश स्वतंत्र हुआ तब देसी राज्यों ने अपने आप को स्वतंत्र मानकर प्रजातंत्र की स्थापना की माँग करने वाले कार्यकर्ताओं के प्रति अपना दमन चक्र आरंभ कर दिया। 1 दिसंबर 1947 से उत्तरदायी शासन के लिए आंदोलन आरंभ करने की घोषणा की गई। आंदोलन आरंभ हुआ पर नारायणदास खरे जी का कोई अता पता नहीं था। सरकार ने उनका पता लगाने वाले को 2000 रुपए का पुरस्कार देने की घोषणा की । ओरछा सेवा संघ द्वारा भी उनका पता लगाने वालों को पुरस्कार देने की घोषणा की गई। बाद में एक दस्यु दल के सदस्य द्वारा उनकी निर्मम हत्या की खबर दी गई । श्री खरे जी 16 नवंबर से 30 नवंबर तक बड़ागांव क्षेत्र के विभिन्न ग्रामों में सभाएं कर आंदोलन की तैयारियां कर रहे थे 1 दिसंबर 1947 को प्रातः 5:00 बजे जब वे अपनी साइकिल द्वारा बड़ागांव से टीकमगढ़ आ रहे थे तब नरौसा नाले पर उनकी पीठ पर गोली दाग दी गई।उसके बाद कुछ प्रतिक्रियावादी सामन्तों ने उन पर कुल्हाड़ी से वार कर उन्हें शहीद कर दिया। उनका पार्थिव शरीर धसान नदी की रेत में गाड़ दिया। बाद में उनके शव के टुकड़े कर धसान नदी के गहरे पानी में डाल दिए गए तथा उनकी साइकिल व कपड़ों को भी पानी में डुबो दिया गया। उनका एक हत्यारा अपने कुकृत्य के कारण पागल हो गया और उसी पागलपन में मृत्यु को प्राप्त हुआ था जबकि दूसरे प्रमुख सूत्रधार ने आत्महत्या कर ली थी। उनके अन्य हत्यारे पर्याप्त साक्ष्य के अभाव में बरी हो गए पर प्रकृति ने उन्हें भी दंड दिया। लगता है खरे जी को अपनी मृत्यु का अहसास हो गया था। जब खरे जी 15 नवंबर 47 को पंडित बनारसीदास चतुर्वेदी के पास अपने आंदोलन के लिए आशीर्वाद लेने गए तो दादाजी ने हंसी हंसी में कहा -खरे जी तुम तो सेंतमेंत में उत्तरदायी शासन चाहते हो तुम्हारे यहां किसी ने कुर्बानी तो दी ही नहीं है? खरे जी ने बड़े ही शांत भाव से कहा था- दादा जी, समय आ गऔ है, बौ सौऊ हुइयै। टीकमगढ़ की जनता के लिए यह उनका अंतिम संदेश था। उनका बलिदान रंग लाया और ओरछा नरेश ने टीकमगढ़ में उत्तरदायी शासन की घोषणा कर दी। जनता द्वारा नरोसा नाले पर उनकी मूर्ति की स्थापना की गई। टीकमगढ़ शहर में भी शान ए पार्क और राजेंद्र अस्पताल चौराहे पर उनकी प्रतिमा स्थापित की गई है, जहां उनके शहीद दिवस 1 दिसंबर को श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है। कहा जाता है कि ‘शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मरने वालों का यही नामो निशां होगा’ काफी समय तक नरोसा नाले पर उनके शहीदी दिवस पर मेले का आयोजन होता रहा है। खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि टीकमगढ़ में उनके त्याग और बलिदान के सम्मान के अनुरूप कोई कार्यक्रम नहीं होता। थोड़े बहुत साहित्यकार और बुद्धिजीवी अवश्य उन्हें माल्यार्पण कर उनके बलिदान का स्मरण कर लेते हैं पर न तो प्रशासन की ओर से कोई कार्यक्रम आयोजित किया जाता है न ही वोट बैंक के लिए कुछ शहीदों के बहु प्रचारित आयोजन करनेवाले किसी राजनैतिक दल या सामाजिक संस्था द्वारा। शहीद किसी जाति विशेष के नहीं होते पर कायस्थ सभा भी उनके सम्मान के लिए कुछ करती दिखाई नहीं देती। कुछ समय पूर्व स्वर्गीय साहित्यकार श्री लालजी सहाय द्वारा उनका श्रद्धांजलि समारोह कुछ गरिमा पूर्ण ढंग से मनाने का प्रयास किया जाता था। टीकमगढ़ की युवा पीढ़ी भी उनके बारे में कुछ विशेष नहीं जानती अस्तु अपेक्षा की जानी चाहिए कि आगामी वर्षों में विशेषकर उनके जन्म दिवस 14 फरवरी को हम सब एक गरिमामय कार्यक्रम का आयोजन कर उन्हें अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करें। प्रयास किया तमाम जानकारी भूमि पुत्र पवन घुवारा ने व्हाट्सएप के माध्यम से प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी है।

