
नर्मदापुरम / मान्यता हैं कि काशी की मणिकर्णिका घाट पर भगवान शिव ने देवी सती के शव की दाह क्रिया की थी। तब से वह महा श्मशान हैं, जहाँ चिता की अग्नि कभी नहीं बुझती। एक चिता के बुझने से पूर्व ही दूसरी चिता में आग लगा दी जाती हैं। वह मृत्यु की लौ हैं जो कभी नहीं बुझती, जीवन की हर ज्योति अंततः उसी लौ में समाहित हो जाती हैं। शिव संहार के देवता हैं न, तो इसीलिए मणिकर्णिका की ज्योति शिव की ज्योति जैसी ही हैं, जिसमें अंततः सभी को समाहित हो ही जाना हैं। इसी मणिकर्णिका के महा श्मशान में शिव होली खेलते हैं। शमशान में होली खेलने का अर्थ समझते हैं ? मनुष्य सबसे अधिक मृत्यु से भयभीत होता हैं। उसके हर भय का अंतिम कारण अपनी या अपनों की मृत्यु ही होती हैं। श्मशान में होली खेलने का अर्थ हैं उस भय से मुक्ति पा लेना। शिव किसी शरीर मात्र का नाम नहीं हैं, शिव वैराग्य की उस चरम अवस्था का नाम हैं जब व्यक्ति मृत्यु की पीड़ा,भय या अवसाद से मुक्त हो जाता हैं। शिव होने का अर्थ हैं वैराग्य की उस ऊँचाई पर पहुँच जाना, जब किसी की मृत्यु कष्ट न दे; बल्कि उसे भी जीवन का एक आवश्यक हिस्सा मान कर उसे पर्व की तरह खुशी खुशी मनाया जाय। शिव जब शरीर में भभूत लपेट कर नाच उठते हैं, तो समस्त भौतिक गुणों-अवगुणों से मुक्त दिखते हैं। यही शिवत्व हैं। शिव जब अपने कंधे पर देवी सती का शव ले कर नाच रहे थे, तब वे मोह के चरम पर थे। वे शिव थे, फिर भी शव के मोह में बंध गए थे। मोह बड़ा प्रबल होता हैं, किसी को नहीं छोड़ता। सामान्य जन भी विपरीत परिस्थितियों में, या अपनों की मृत्यु के समय यूँ ही शव के मोह में तड़पते हैं। शिव शिव थे, वे रुके तो उसी प्रिय पत्नी की चिता भष्म से होली खेल कर युगों युगों के लिए वैरागी हो गए। मोह के चरम पर ही वैराग्य उभरता हैं न। पर मनुष्य इस मोह से नहीं निकल पाता, वह एक मोह से छूटता हैं तो दूसरे के फंदे में फंस जाता हैं। शायद यही मोह मनुष्य को शिवत्व प्राप्त नहीं होने देता। कहते हैं काशी शिव के त्रिशूल पर टिकी हैं। शिव की अपनी नगरी हैं काशी। कैलाश के बाद उन्हें सबसे अधिक काशी ही प्रिय हैं। शायद इसी कारण काशी एक अलग प्रकार की वैरागी ठसक के साथ जीती हैं। मणिकर्णिका घाट, हरिश्चंद घाट, युगों युगों से गंगा के इस पावन तट पर मुक्ति की आशा ले कर देश-विदेश से आने वाले लोग वस्तुतः शिव की अखण्ड ज्योति में समाहित होने ही आते हैं।
(संकलन – प्रीति चौहान)
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