
नर्मदापुरम /श्राद्ध पक्ष पितरों के प्रति सम्मान और श्रद्धा व्यक्त करने का एक महत्वपूर्ण अवसर है, जो दिवंगत पूर्वजों को समर्पित है पितरों का आशीर्वाद प्राप्त करने, और पितृदोष से मुक्ति पाने का एक महत्वपूर्ण अवसर है।
यह 16 दिनों की अवधि होती है,लेकिन इस वर्ष श्राद्ध पक्ष 15 दिन होगा. जिसमें पितृ (पूर्वजों) की आत्मा की शांति के लिए विशेष पूजा, तर्पण, और पिंडदान किया जाता है मान्यता है कि श्राद्ध करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है और परिवार को उनका आशीर्वाद मिलता है, जिससे सुख, शांति और समृद्धि आती है।
श्राद्ध पक्ष में, पितृगण (पूर्वज) पृथ्वी पर आते हैं और अपने परिवार के सदस्यों द्वारा किए गए श्राद्ध कर्मों से संतुष्ट होते हैं यह माना जाता है कि यदि श्राद्ध कर्म ठीक से नहीं किया जाता है, तो पितृदोष हो सकता है, जिससे जीवन में समस्याएं आ सकती हैं
इसलिए, श्राद्ध पक्ष में पितरों के प्रति श्रद्धा और सम्मान व्यक्त करना आवश्यक है.
श्राद्ध पक्ष में, ब्राह्मणों को भोजन कराना, पिंडदान करना, तर्पण करना, और दान-दक्षिणा देना महत्वपूर्ण माना जाता है इसके अलावा, कौओं, गायों, और कुत्तों को भी भोजन कराना शुभ माना जाता है
श्राद्ध पक्ष में उपयोग की जाने वाली कुछ महत्वपूर्ण सामग्री में कुशा, तिल, गंगाजल, गाय का दूध, जौ, और चावल शामिल हैं
संक्षेप में, श्राद्ध पक्ष पितरों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने,उनका आशीर्वाद प्राप्त करने, और पितृदोष से मुक्ति पाने का एक महत्वपूर्ण अवसर है.
श्राद्ध पक्ष 2025, 7 सितंबर से शुरू होकर 21 सितंबर तक चलेगा यह 16 दिवसीय अवधि पितरों को समर्पित होती है, जिसमें उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त की जाती है और उनका आशीर्वाद मांगा जाता है.
*श्राद्ध पक्ष 2025 की श्राद्धयोग्य तिथियाँ:-*
07 सितम्बर – रविवार *श्राद्ध पक्ष प्रारंभ*
और *पूर्णिमा व्रत* *श्राद्धपूर्णिमा* *चंद्र ग्रहण*
08 सितंबर – सोमवार *प्रतिपदा श्राद्ध*
09 सितंबर – मंगलवार *द्वितीया श्राद्ध*
10 सितंबर – बुधवार *तृतीया – चतुर्थीश्राद्ध* और *साय 04: 03 मिनट पर *पंचक का समापन*
11 सितंबर – गुरुवार, *पंचमी श्राद्ध*
12 सितंबर -शुक्रवार, षष्ठी श्राद्ध
(षष्ठी तिथि)
विशेषता: भरणी नक्षत्र में पड़ने वाला श्राद्ध, पितृ पक्ष का एक महत्वपूर्ण, *दिन महत्व:*
भरणी नक्षत्र को मृत्यु के देवता यम का नक्षत्र माना जाता है, इसलिए भरणी श्राद्ध का विशेष महत्व है ऐसा माना जाता है कि इस दिन श्राद्ध करने से गया में श्राद्ध करने के समान फल मिलता है.
13 सितंबर -शनिवार, सप्तमी श्राद्ध (सप्तमी तिथि)
14 सितंबर -रविवार, अष्टमी श्राद्ध (अष्टमी तिथि)
15 सितंबर – सोमवार, नवमी श्राद्ध (नवमी तिथि)
16 सितंबर – मंगल, दशमी श्राद्ध (दशमी तिथि)
17 सितंबर -बुधवार एकादशी श्राद्ध (एकादशी तिथि)
18 सितंबर – गुरूवार, द्वादशी श्राद्ध (द्वादशी तिथि)
19 सितंबर – शुक्रवार, त्रयोदशी, मघा श्राद्ध (त्रयोदशी तिथि और मघा नक्षत्र)
20 सितंबर – शनिवार, चतुर्दशी श्राद्ध (चतुर्दशी तिथि)
चतुर्दशी का श्राद्ध:
अकाल मृत्यु (जैसे, दुर्घटना, आत्महत्या) या अज्ञात कारणों से हुई मृत्यु वालों का श्राद्ध इस दिन किया जाता है.
21 सितंबर- रविवार, सर्व पितृ अमावस्या (अमावस्या तिथि)
इस दौरान, लोग अपने पितरों की तिथि के अनुसार श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करते हैं.
*सर्वपितृ अमावस्या:*
यदि किसी परिजन की मृत्यु की तिथि ज्ञात न हो,तो सभी का श्राद्ध इस दिन किया जाता है।
*अन्य महत्वपूर्ण बातें:*
श्राद्ध कर्म, दिवंगत पूर्वजों की मृत्यु तिथि के अनुसार ही करना उचित माना जाता है
यदि किसी की मृत्यु तिथि ज्ञात न हो, तो सर्वपितृ अमावस्या के दिन श्राद्ध किया जा सकता है.
श्राद्ध पक्ष में, पितरों को तर्पण और पिंडदान करने से उन्हें शांति मिलती है और पितृ दोष से मुक्ति मिलती है।
*तिथिनुसार श्राद्ध का फल*
प्रतिपदा धन-सम्पत्ति के लिए होती है एवं श्राद्ध करनेवाले की प्राप्त वस्तु नष्ट नहीं होती, द्वितिया को श्राद्ध करने वाला व्यक्ति राजा होता है। उत्तम अर्थ की प्राप्ति के अभिलाषी को तृतिया विहित है यही तृतिया शत्रुओं का नाश करने वाली और पाप नाशिनी है।
जो चतुर्थी को श्राद्ध करता है वह शत्रुओं का छिद्र देखता है अर्थात उसे शत्रुओं की समस्त कूटचालों का ज्ञान हो जाता है।
पंचमी तिथि को श्राद्ध करने वाला उत्तम लक्ष्मी की प्राप्ति करता है.
जो षष्ठी तिथि को श्राद्धकर्म संपन्न करता है उसकी पूजा देवता लोग करते हैं।
जो सप्तमी को श्राद्धादि करता है उसको महान यज्ञों के पुण्यफल प्राप्त होते हैं और वह गणों का स्वामी होता है।
जो अष्टमी को श्राद्ध करता है वह सम्पूर्ण समृद्धियाँ प्राप्त करता है.
नवमी तिथि को श्राद्ध करने वाला प्रचुर ऐश्वर्य एवं मन के अनुसार अनुकूल चलने वाली स्त्री को प्राप्त करता है।
दशमी तिथि को श्राद्ध करने वाला मनुष्य ब्रह्मत्व की लक्ष्मी प्राप्त करता है।
एकादशी का श्राद्ध सर्वश्रेष्ठ दान है वह समस्त वेदों का ज्ञान प्राप्त कराता है उसके सम्पूर्ण पापकर्मों का विनाश हो जाता है तथा उसे निरंतर ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।
द्वादशी तिथि के श्राद्ध से राष्ट्र का कल्याण तथा प्रचुर अन्न की प्राप्ति कही गयी है।
त्रयोदशी के श्राद्ध से संतति, बुद्धि, धारणाशक्ति, स्वतंत्रता, उत्तम पुष्टि, दीर्घायु तथा ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।
चतुर्दशी का श्राद्ध जवान मृतकों के लिए किया जाता है तथा जो हथियारों द्वारा मारे गये हों उनके लिए भी चतुर्दशी को श्राद्ध करना चाहिए।
अमावस्या का श्राद्ध समस्त विषम उत्पन्न होने वालों के लिए अर्थात तीन कन्याओं के बाद पुत्र या तीन पुत्रों के बाद कन्याएँ हों उनके लिए होता ह जुड़वे उत्पन्न होने वालों के लिए भी इसी दिन श्राद्ध करना चाहिए.
सधवा अथवा विधवा स्त्रियों का श्राद्ध आश्विन (गुजरात-महाराष्ट्र के मुताबिक भाद्रपद) कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि के दिन किया जाता है.
बच्चों का श्राद्ध कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को किया जाता है।
दुर्घटना में अथवा युद्ध में घायल होकर मरने वालों का श्राद्ध कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को किया जाता है।
जो इस प्रकार श्राद्धादि कर्म संपन्न करते हैं वे समस्त मनोरथों को प्राप्त करते हैं और अनंत काल तक स्वर्ग का उपभोग करते हैं मघा नक्षत्र पितरों को अभीष्ट सिद्धि देने वाला है अतः उक्त नक्षत्र के दिनों में किया गया श्राद्ध अक्षय कहा गया है पितृगण उसे सर्वदा अधिक पसंद करते हैं।
जो व्यक्ति अष्टकाओं में पितरों की पूजा आदि नहीं करते उनका यह जो इन अवसरों पर श्राद्धादि का दान करते हैं वे देवताओं के समीप अर्थात् स्वर्गलोक को जाते हैं और जो नहीं करते वे तिर्यक्(पक्षी आदि अधम) योनियों में जाते हैं।
रात्रि के समय श्राद्धकर्म निषिद्ध है । (वायु पुराणः 78.3)
शास्त्रों में ऐसा बताया गया है कि अगर पूरी श्रद्धा से पितृ पक्ष के दौरान ब्राह्मणों को दान किया जाए तो पितरों की आत्मा को संतुष्टि मिलती है और उन्हें सीधे मोक्ष की प्राप्ति होती है अब ये जानना सभी के लिए बेहद आवश्यक है कि दान में ऐसी कौन सी चीज़ों को शामिल करना चाहिए जिससे पितरों को मोक्ष की प्राप्ति हो और वो प्रसन्न होकर आशीर्वाद दें तो आगे हम बताएंगे कि पितृ पक्ष के दौरान ब्राह्मणों को क्या दान करना चाहिए।
*पितृ पक्ष के दौरान ब्राह्मणों को क्या दान करें?*
पितृ पक्ष के दौरान वैसे तो कोई भी व्यक्ति अपनी श्रद्धा के अनुसार ब्राह्मणों को कुछ भी दान कर सकता है, सब शुभ ही होता है लेकिन फिर भी ऐसी कुछ चीज़ें बताई गईं हैं जिनको पितृ पक्ष के दौरान अवश्य दान करना चाहिए जैसे-
*गोदान-*
गोदान यानी गाय का दान हिंदू धर्म में गाय का बहुत महत्व है गाय को माता का स्वरूप माना जाता है ऐसा माना जाता है कि गाय में 33 कोटि देवता वास करते हैं गाय की आत्मा को परलोक तक पहुंचाने में बहुत अधिक भूमिका होती है गाय ही आत्मा को वैतरणी नदी पार कराने में मदद करती है इसीलिए हमेशा पूजा पाठ के समय गाय दान किया जाता है वहीं पितृ पक्ष के दौरान गाय का दान बहुत ही शुभ माना गया है ऐसा माना जाता है कि अगर श्राद्ध पक्ष में किसी ब्राह्मण को गोदान किया जाए तो इससे पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है इसके साथ ही गोदान करते समय ये बात पर भी विशेष ध्यान देना चाहिए कि गोदान ऐसे ब्राह्मण को किया जाना चाहिए जो यज्ञ करवाता हो, जो विधुर न हो, जिसका कोई अंग खराब न हो..
*अन्न दान-*
अगर कलयुग की बात करें तो अन्न दान की गिनती महा दान में की जाती है। यही कारण है कि पितृ पक्ष के दौरान ब्राह्मण को अन्न दान करना चाहिए अगर ब्राह्मण को अन्न दान न कर सकें तो किसी जरूरतमंद व्यक्ति को अन्न का दान अवश्य करें जब भी कोई व्यक्ति अन्न दान करे तो ये ध्यान रखे कि अन्न दान करते समय किसी भी तरह का कोई अभिमान मन के अंदर नहीं होना चाहिए अन्न दान से प्रशन्न होकर पितर अपना आशीर्वाद देते हैं और वंश में वृद्धि होती है।
*नमक दान-*
नमक के बिना तो हर एक भोजन अधूरा है इसके बिना कोई भी भोजन परिपूर्ण नहीं है इसीलिए श्राद्ध पक्ष में नमक का दान किया जाना भी अत्यंत आवश्यक है श्राद्ध पक्ष में जब किसी व्यक्ति के द्वारा अन्न दान किया जाए, उसके साथ में नमक का दान भी किया जाना चाहिए नमक दान करने को लेकर यह मान्यता है कि पितरों के कर्ज से मुक्ति मिल जाती है और इसके साथ- साथ नकारात्मक ऊर्जा से भी मुक्ति मिलती है और सकारात्मक ऊर्जा आती है।
*तिल दान-*
पितृ पक्ष के दौरान काले तिल का महत्व बढ़ जाता है पितरों के लिए की गई किसी भी तरह की पूजा या श्राद्ध में तिल का विशेष महत्व होता है ये भी माना जाता है कि अगर कोई व्यक्ति अपने पूर्वजों को बिना तिल के जल देता है तो वो जल पितरों को प्राप्त ही नहीं होता है इसीलिए इसका विशेष महत्व है यदि कोई व्यक्ति श्राद्ध करने में असमर्थ है तो वो श्राद्ध पक्ष में एक मुट्ठी तिल ब्राह्मण को दान कर दे ब्राह्मण को तिल दान करने से श्राद्ध करने जितना ही पुण्य प्राप्त होता है.
*वस्त्रों का दान-*
पितृ पक्ष के दौरान ब्राह्मणों को वस्त्रों का दान भी अवश्य किया जाना चाहिए ऐसा माना गया है कि एक मनुष्य की तरह ही पितरों को भी सर्दी और गर्मी का एहसास होता है यही कारण है कि पितर अपने परिजनों से वस्त्र की इच्छा रखते हैं ऐसे में यदि पितृ पक्ष के दौरान ब्राह्मणों को वस्त्रों का दान किया जाता है तो पितर प्रशन्न होते हैं और उनका आशीर्वाद परिवार पर बना रहता है। (संकलन – प्रीति चौहान)

