ग्वालियर में हैवानियत: बेटी पैदा होने से नाराज पति ने पत्नी और 4 माह की मासूम पर फेंका एसिड।
ग्वालियर। मध्य प्रदेश के ग्वालियर में रिश्तों को शर्मसार करने वाली एक जघन्य वारदात सामने आई है। यहाँ एक कलयुगी पिता ने दहेज की हवस और बेटा न होने के गुस्से में अपनी पत्नी और मात्र चार महीने की मासूम दुधमुंही बच्ची पर तेजाब (एसिड) फेंक दिया। घटना शहर की मैनावाली गली की है, जहाँ एसिड के छीटों से मासूम बच्ची बुरी तरह झुलस गई है।
दहेज और शराब की लत ने बर्बाद किया घर
पीड़िता की शादी करीब ढाई साल पहले डबरा निवासी युवक से हुई थी। शादी के कुछ समय बाद ही पता चला कि पति शराब का आदी है और लगातार मायके से कीमती सामान और नकदी लाने के लिए दबाव बनाता था। रिश्तेदारों की समझाइश के बावजूद आरोपी का व्यवहार नहीं बदला।
‘बेटी क्यों हुई?’— इसी बात पर छिड़ा विवाद
पीड़िता ने पुलिस को बताया कि चार महीने पहले जब उसने बेटी को जन्म दिया, तो आरोपी पति और ज्यादा प्रताड़ित करने लगा। वह आए दिन ‘बेटा न होने’ का ताना देकर मारपीट करता था। चार दिन पहले फिर से दहेज को लेकर विवाद हुआ, जिसके बाद आरोपी ने पत्नी पर तेजाब फेंक दिया। पीड़िता तो किसी तरह बच गई, लेकिन एसिड दीवार से टकराकर पास में सो रही 4 माह की बच्ची पर जा गिरा।
गंभीर रूप से झुलसी बच्ची को लेकर मां अपने मायके भाग गई और प्राथमिक उपचार के बाद गुरुवार को कोतवाली थाने में मामला दर्ज कराया। कोतवाली थाना प्रभारी मोहनी वर्मा के अनुसार, आरोपी फिलहाल फरार है और पुलिस की टीमें उसकी तलाश में जुटी हैं।
एमपी में डरा रहे हैं दहेज उत्पीड़न के आंकड़े
यह घटना केवल एक आपराधिक मामला नहीं है, बल्कि मध्य प्रदेश में महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों की गंभीर तस्वीर पेश करती है। विधानसभा में प्रस्तुत सरकारी आंकड़े बेहद चिंताजनक हैं:
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दहेज हत्याएं: पिछले 18 महीनों में प्रदेश में कुल 719 महिलाओं की दहेज के कारण जान गई है।
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हर दिन एक मौत: आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि राज्य में औसतन हर दिन एक महिला दहेज उत्पीड़न की भेंट चढ़ रही है।
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वर्षवार स्थिति:
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2024: पूरे वर्ष में 459 दहेज हत्याएं दर्ज की गईं।
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2025 (प्रथम 6 माह): मात्र छह महीनों में ही 239 महिलाओं की मौत हुई।
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| समयावधि | दर्ज दहेज हत्याएं |
| 15-31 दिसंबर 2023 | 21 |
| वर्ष 2024 | 459 |
| वर्ष 2025 (जनवरी – जून) | 239 |
| कुल (18 माह) | 719 |
विशेष टिप्पणी: प्रशासन और समाज के लिए यह विचारणीय प्रश्न है कि ‘बेटी बचाओ’ जैसे अभियानों के बीच आज भी मासूम बच्चियां और महिलाएं अपनों के ही बीच सुरक्षित क्यों नहीं हैं?
आज का विचार-आज भी हमारे समाज में लड़कियों को बोझा क्यों समझा जाता है


