प्रदीप गुप्ता / नर्मदा पुरम/ नगर के सेठानी घाट पर आयोजित सप्त दिवसीय श्री शिव महापुराण कथा के दूसरे दिवस भागवत आचार्य पंडित सोमनाथ शर्मा जी ने कथा को प्रारंभ करते हुए शिव महापुराण की प्रथम संहिता श्री विदेश्वर संहिता की कथा को सुनाया। उन्होंने बताया कि जब सूतजी से शौनक जी ने प्रश्न किया था कि भगवान शिव का पूजन लिंग में क्यों किया जाता है और लिंग का अर्थ क्या होता है। तब श्री सूत जी महाराज ने कथा सुनाते हुए कहा कि जिस प्रकार सनकादिक ऋषियों ने नंदीकेश्वर से प्रश्न किया था और नंदीकेश्वर महाराज ने शिवलिंग के रहस्य का उद्घाटन करते हुए इस विषय को कहा था वही मैं आप से कहता हूं एक बार जब ब्रह्मा और विष्णु जी के मध्य युद्ध हो गया तब भगवान शिव का प्राकट्य लिंग के रूप में हुआ अर्थात ज्योति के रूप में हुआ लिंग का अर्थ होता है प्रतीक व चिन्ह भगवान शिव साकार हैं और निराकार भी है ब्रह्म का जो प्रतीक है वह लिंग है और सगुण साकार भी हैं। इसलिए मूर्ति में भी उनका पूजन होता है। ब्रह्मा विष्णु ने जब उनके और चोर का पता नहीं लगा पाए तब आकर भी नतमस्तक हो गए और भगवान विष्णु को भगवान शिव ने पूज्य होने जगत में पूछने का आशीर्वाद दिया शिवलिंग कई प्रकार के होते हैं। इसका वर्णन शिवपुराण में है और साथ ही साथ शिवपुराण की कथा में व्यास जी ने कहा कि भगवान शिव के मुख से सबसे पहले ओंकार प्रकट हुआ था उसके पश्चात ओंकार से नमः शिवाय पंचाक्षर मंत्र उत्पन्न हुआ था और उसी से गायत्री मंत्र और उसी से सभी वेदों का विस्तार हुआ था तथा के द्वितीय दिवस भगवान शिव की महिमा का वर्णन किया गया। कथा का समय प्रतिदिन दोपहर 2:00 बजे से 6:00 बजे तक है कथा का आयोजन श्री नीलकंठ महादेव समिति के द्वारा कराया जा रहा है।

