प्रदीप गुप्ता/ नर्मदापुरम/ (जगन्नाथपुरी,उड़ीसा) सच्चे भक्त को ही भगवान के सानिध्य का सौभाग्य प्राप्त होता है। सतयुग में इंसान की उम्र 1 लाख वर्ष तक की होती थी। त्रेता युग में यह घटकर 10 हजार वर्ष हो गई। द्वापर युग में यह पुनः घटकर 1 हजार वर्ष हो गई तो कलयुग में यह पुनः 10 गुना घटकर मात्र 100 वर्ष रह गई है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि मानव सभ्यता व भारतीय संस्कृति का किस तरह उत्तरोत्तर पराभव हुआ है। उक्त उदगार के साथ आज शनिवार, सुबह 10 बजे से, तृतीय दिवस, सम्पूर्ण जगत के नाथ माने जाने वाले भगवान श्री जगन्नाथ की पुरी में होटल नीलाद्री के सभागार में भागवताचार्य पंडित नरेन्द्र तिवारी, हनुमान धाम इटारसी ने श्री मद भागवत ज्ञान गंगा का संवाहन प्रारंभ किया। उन्होंने कहा कि वास्तव में विदुर जी धर्मराज ही थे जो एक ऋषि मांडव के श्राप के कारण मृत्यु लोक में आए थे। सच तो यह है कि श्री कृष्ण व द्रोपदी चाहते थे कि महाभारत का युद्ध हो। क्योंकि वे जानते थे कि अधर्म से धर्म की रक्षा के लिए यही एकमात्र विकल्प था। युद्ध के अंत में भी सिर्फ वही जीवित बचे जिनमें देवत्व था। श्री कृष्ण तो साक्षात परमात्मा ही थे। द्रोपदी भी ध्रुपद के हवन कुंड से जन्मी थी। पांचों पांडव भी किसी न किसी देवता के अंश स्वरूप ही थे तो परीक्षित को तो स्वयं श्री कृष्ण ने उत्तरा के गर्भ में ही ब्रह्मास्त्र से बचाया था। ताकि धर्म का राज्य द्वापर में आगे बढ़ सके व वे कलयुग के आगमन की पृष्ठभूमि बना सकें। पंडित तिवारी ने कहा कि भगवान सिर्फ भक्त का भाव ही देखते हैं और कुछ नहीं। विदुर के घर भोजन करने के लिए वे महारानी गांधारी द्वारा बनाए गए भोजन को भी नहीं स्वीकारते और विदुरानी के भाव प्रभाव में केले के छिलके भी बड़ी खुशी से खा जाते हैं। आगमन की बेला में इस कथा के प्रथम वक्ता श्री शुकदेव जी के जन्म की अद्भुत कथा से किया। उन्होंने आज श्री कृष्ण व दुर्योधन संवाद पर केंद्रित सूरदास का एक बहुत खूबसूरत भजन भी सुनाया। कल 25 दिसंबर को श्री कृष्ण जन्म की कथा व उत्सव के उपरांत इटारसी से उनके साथ आए करीब 200 धर्म प्रेमियों को समुद्र तट पर उनके पितरों की मुक्ति के लिए तर्पण आदि कार्य कर्मकांडी ब्राम्हणों द्वारा कराया जायेगा। इस ज्ञान यज्ञ के मुख्य यजमान राजेंद्र अग्रवाल, भौरा वाले हैं। सह यजमान प्रोफेसर डा.विनोद सीरिया हैं। अन्य कुछ यजमानों द्वारा भी अपनी तरफ से अलग अलग पंडितों द्वारा पृथक पृथक भागवत कथा का मूल पाठ भी कराया जा रहा है।

