नर्मदापुरम/ रेखा रतनानी/ होली को प्राचीन हिंदू त्योहारों में से एक माना जाता है। होलिका का वर्णन कई ग्रंथों पुराणों कथाओं में भी है। यहां तक प्राचीन भारत के मंदिरों की दीवारों पर होली, होलिका की चित्रकला व मूर्तियां प्रतिष्ठित है। भारत के प्रमुख त्योहारों में से एक होली जिसे आमतौर पर रंगों का त्योहार भी कहते हैं। हिंदू पंचांग के मुताबिक फागुन माह में पूर्णिमा के दिन मनाई जाती है। होली को बुराई पर अच्छाई की जीत भी माना जाता है, तो वहीं यह त्यौहार राधा कृष्ण की प्रेम कहानियों से भी जुड़ा हुआ है। कहा ये जाता है कि बसंत के इस मोहक मौसम में एक दूसरे पर रंग डालना श्री राधा कृष्ण की लीला का एक अंग माना जाता है। होली के दिन वृंदावन श्री राधा कृष्ण के इसी रंग में डूबा हुआ होता है। होली के साथ कई_कई प्राचीन पौराणिक कथाएं भी जुड़ी है और हर कथा अपने आप में विशेष है।
*अत्यधिक प्रचलित कथा भक्त प्रहलाद, हिरण कश्यप और उसकी बहन होलिका की है*
जिसमें यह भी एक पौराणिक कथा है वह भगवान शिव और माता पार्वती की, कथा अनुसार हिमालय पुत्री माता पार्वती चाहती थी कि उनका विवाह भगवान शिव से हो, किंतु भगवान शिव अपनी तपस्या में लीन थे। तभी कामदेव माता पार्वती की सहायता के लिए आते हैं और प्रेम बाण चलाते हैं। जिससे भगवान शिव की तपस्या भंग हो जाती है। भगवान शिव जी को उस दौरान बड़ा क्रोध आता है और वह अपनी तीसरी आंख खोल क्रोध की ज्वाला में कामदेव का शरीर भस्म कर देते हैं। इन सब के बाद भगवान शिव माता पार्वती को देखते हैं, माता पार्वती की आराधना सफल हो जाती है और भगवान शिव जी उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लेते हैं। होली की आग में आपसी बुराई को प्रतीकात्मक रूप से जलाकर सच्चे प्रेम के विजय के उत्सव में मनाया जाता है।

