नर्मदापुरम/ प्रदीप गुप्ता/ कहते हैं कि प्रतिभा जन्मजात होती है वह कर दिखाया है डॉक्टर जया नरगिस ने । बता दे कि जया नरगिस को पैर में तकलीफ के कारण चलने में तकलीफ है पर उसके बाद भी अपनी हिकमत से उन्होंने उस मुकाम को हासिल कर लिया जिसकी चाहत उनके दिल में थी। आपको बता दें कि जया नरगिस ग़ज़ल लेखन के क्षेत्र नई ज़मीन खोजने में माहिर राष्ट्रीय स्तर पर एक स्थापित नाम है। इन्हें पद्मश्री डॉ बशीर बद्र, डॉ. कैफ़ी आज़मी, मजरूह सुल्तानपुरी, वसीम बरेलवी, रज़ा रामपुरी जैसे दिग्गज शायरों से प्रशस्ति एवं प्रशंसा प्राप्त हुई है। आपकी रचनाओं को पद्मश्री उस्ताद अहमद हुसैन मो.हुसैन, सुरेश वाडकर, गुंदेचा ब्रदर्स, संगीतज्ञ जयश्री तरडे, अभिजीत राजे, रागिनी तरडे, रेहान खान , वर्षा श्रीवास्तव, संजय शुक्ला आदि ने अपने एलबम्स में गाया है जिन्हें सारेगामा, शेमारू, ज़ी म्यूसिक, डी म्यूज़िक , जे टी प्रोडक्शन आदि से रिलीज़ होकर लाखों से अधिक व्यूवर्स द्वारा देखे गए। ग़ज़लों के अलावा उपन्यास, कहानी कविता भजन और गीत संग्रह के रूप में 14 किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। जिन्हें दो बार राष्ट्रीय पुरस्कार और अन्य पुरस्कार प्राप्त हुए। कबीर वाणी को बुंदेली लोक संगीत में निबद्ध करने के जया नरगिस केअभिनव प्रयोग को भारत सरकार से मान्यता प्राप्त है। अपने संघर्षमयी जीवन में जया नरगिस ने साहित्य और संगीत की साधना कभी नहीं छोड़ी। आपके पास आकाशवाणी और दूरदर्शन से ग़ज़ल गायकी का लंबा अनुभव है। आपने गायन वादन की विधिवत शिक्षा प्राप्त की है और शिष्य तैयार किए हैं। अपने कर्म पर जया नरगिस का विश्वास उनके इन दो लाईनों से प्रकट होता है-
मुझे मिटाने की कोशिश तो कर रहा है बहुत,
ये उसके बस में नहीं कामयाब हो जाए
चले भी आओ के ऐसा न हो तुम्हारी याद
किसी किताब का सूखा गुलाब हो जाए।

