प्रदीप गुप्ता/ नर्मदापुरम/ ग्राम गुनौरा के प्रांगण में श्रीमद भागवत कथा के छठे दिवस राम नरेश द्विवेदी ने गोवर्धन पर्वत श्री गिरनारी की महिमा का व्याख्यान देते हुए कहा कि बृज में गोवर्धन महाराज के रूप में स्वयं कृष्ण विराजते है और वे इंद्रदेव के मान का मर्दन करने के लिए स्वयं ही स्वयं की पूजा बृजवासियों से करवाते हैं, जिसमे बलदाऊ मेढ़ बनकर और सुदर्शन चक्र स्वयं रक्षक बनके इंद्रदेव के वर्षा जल प्रलय को सोख लेते हैं। जिसके उपरांत सुरभि गाय भगवान का अभिषेक करते हुए उनका नामकरण गोविंद के रूप में करती है।यहां इंद्रदेव को तो भगवान क्षमा कर देते हैं लेकिन ब्रह्मा जी द्वारा ग्वालों का हरण एक वर्ष तक करने पर उनके चतुश्लोकी प्रार्थना करने पर भी भगवान उनसे रूठे ही रहते हैं। क्योंकि इंद्रदेव ने तो गोकुल वासियों को बृज में एक कर दिया किंतु ब्रह्मा जी ने वहां गोकुल वासियों को बृज से अलग करने का कार्य किया था। इसलिए ब्रह्मा जी प्रभु के कृपापात्र न पाए। तदोपरांत भगवान गोपियों के साथ रासलीला करते हुए सर्वप्रथम उनकी परीक्षा लेते हैं और कहते कि है कि गोपियों तुम्हें अपने पति की सेवा पहले करनी चाहिए तो गोपियां अपने पतियों को चित्रपट बताते हुए परमात्मा को ही अपना पति परमेश्वर बताती है। जिसके बाद श्री कृष्ण जी गोपियों के सम्मुख नि: शब्द हो जाते हैं और रासलीला रचते हैं। इसके बाद अक्रूर जी की कथा सुनाते हुए श्री द्विवेदी कहते हैं कि भगवान दो भुज में जैसे गोकुल बाल्यरूप में आए थे वैसे ही चतुर्भुज रूप धारण करके वापस अक्रूर जी के साथ मथुरा प्रस्थान करते हैं और मल युद्धोपरांत कंस का वध करके उसका उद्धार करते हैं, जिसके बाद मथुरा पर जरासंख का सत्रह बार आक्रमण होता है और श्री कृष्ण हर बार विजय प्राप्त करते हैं किंतु जब जरासंख ब्राह्मणों की आड़ लेता है तो भगवान रणभूमि छोड़कर स्वयं पराजित होकर रणछोड़ राय भगवान कहलाते हैं। इसके उपरांत भगवान द्वारा रुकमणी जी हरण की कथा सुनाते हुए पंडित श्री द्विवेदी ने कथा में ही रुकमणी जी विवाह का दृश्य चित्रण कथा प्रांगण में आयोजित करवाया जिसके लिए पालनपुर ग्राम वासियों के साथ जनपद पंचायत सदस्य यशवंत गौर बाराती बनकर भगवान श्री कृष्ण को लेकर पधारे। तत्पश्चात् श्रृंगार से सजी तुलसी मैया का विवाह बड़े ही धूमधाम से करवाया गया। तुलसी जी का कन्यादान रजनीश निमिषा दुबे ने करते हुए भगवान सालिगराम जी का पूजन किया और पुजारन दादी मां जमना बाई ने नाती पंती देखने की खुशी में स्वर्ण सीढ़ियों का दान धर्म निभाया।

