टीकमगढ़// समर्पयामि फाउण्डेशन द्वारा ‘अम्मा की बगिया’ बाल-साहित्य केंद्रित गोष्ठी एवं विमर्श का आयोजन किया गया! मुख्यअतिथि वरेण्य डॉ. विकास दवे, निदेशक साहित्य अकादमी मध्यप्रदेश रहे। जबकि अध्यक्ष श्रीकृष्ण के बालगोपाल स्वरुप विग्रह श्री केशव रहे|
स्वागत-सत्र में मुख्यअतिथि श्रीमन डॉ. विकास दवे जी का स्वागत समर्पयामि संस्था के श्रीमती उमा देवी पाराशर, अनुज पं. योगेश्वर प्रसाद पाराशर, विनीश गुप्ता, राजेंद्र लाल, चाँद मुहम्मद आखिर द्वारा शाल, श्रीफल व समर्पयामि का शुभंकर प्रदान कर सम्मान किया।
तत्पश्चात विभिन्न संस्थाओं द्वारा श्री दवे जी का सम्मान किया गया।
विजय मेहरा, शीलचंद जैन, रामगोपाल रैकवार राष्ट्रभाषा प्रचार समिति टीकमगढ़, राजीव नामदेव लिधौरी राना (जिलाध्यक्ष मप्र लेखक संघ, संपादक आकांक्षा पत्रिका), श्रीमती रश्मि गोयल, महेंद्र द्विवेदी , द्वारा किया गया।
गणमान्य में आर. पी. तिवारी, (तुलसी साहित्य अकादमी), उर्दू अकादमी के जिला समन्वयक चांद मोहम्मद आखिर,स्वप्निल तिवारी, गुलाब सिंह भाऊ, प्रमोद गुप्ता मृदुल, मुन्नालाल मिश्रा, सत्यनारायण तिवारी, एस. आर. सरल, , अनवर साहिल, रविंद्र यादव, विशाल कड़ा ,पृथ्वीपुर से एम. एस. श्रीवास्तव व मातृशक्तियों में डॉ. लीना कुलथिया, श्रीमती मीनू गुप्ता, डॉ. प्रीति सिंह परमार (जिला उपभोक्ता आयोग, टीकमगढ़) उपस्थित रहे।
अतिथि-पुस्तकार्पण सत्र में लेखक अजीत श्रीवास्तव, मीनू गुप्ता,पूरनचन्द्र गुप्ता (अ.भा. साहित्य परिषद) एवं लेखिका डॉ. प्रीति सिंह परमार (जिला उपभोक्ता आयोग, टीकमगढ़) ने मुख्यअतिथि डॉ. दवे जी महोदय को अपनी कृतियाँ अर्पित कीं| कौशल किशोर भट्ट साथ रहे|
कार्यक्रम-योजना के निर्माण में उमाशंकर मिश्र ‘उमा’ (मुख्य कार्यपालन अधिकारी, जिला पन्ना) एवं स्वनामधन्य चित्रकार श्रीमती अंजलि अग्रवाल कलाधाम, नोएडा से अप्रत्यक्ष रूप से साथ रहे|
यह गोष्ठी समर्पयामि फाउण्डेशन की संस्थापक व प्रथम इकाई माताजी श्रीमती उमादेवी पाराशर के जन्मदिवस पर की गयी अतएव सब अतिथियों ने उन्हें स्वस्थ, आरोग्य व प्रसन्नतापूर्वक रहने के आशीष और कामना के वचन कहे और बालसाहित्य विषयन्तर्गत गीत, कविता, कहानी रचनाएं सुनाई| रचनापाठ सत्र का संचालन ‘जिला समन्वयक मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी टीकमगढ़’ चाँद मुहम्मद आखिर ने किया|
एक गोष्ठी एक बालकार्यशाला थी, जिसमें पंद्रह लगभग बालक-बालिकायें भी थे, जो अपने हाथों से पन्नों के बने कृति व रंगीन चित्र लेकर आये और डॉ. दवे और माताजी उमा जी को समर्पित किये| सब बालकों ने डॉ. दवे व माताजी के चरण स्पर्श कर उनसे आशीर्वाद प्राप्त किया| संस्था की ओर से डॉ. दवे ने खुशी, शिवानी, राम, शिव, रागिनी, रेशमा, कार्तिक, अंजलि, गुड्डू, पुण्य, चांदनी, दीपिका रौशनी को प्रमाणपत्र वितरित किये।
डॉ. दवे ने अपने उद्बोधन में बताया कि उमादेवी पाराशर युवावस्था में सरस्वती शिशु मंदिर में सेवार्थी रहीं, बालकों को गीत सिखाती रहीं, गीतों को संगीतबद्ध किया, इस नाते वे मेरी पूर्ववर्ती आचार्या हैँ। अब वे पन्नो पर बालसाहित्य के स्फुट गीत उठायें, उन्हें समेटें व संग्रह करें|
गीतिका वेदिका ने नया प्रयोग यह किया कि बालसाहित्य में लड्डूगोपाल की अध्यक्षता कराई है| इस तरह के नवाचार बालसाहित्य की आवश्यकता थी| इतना सुंदर प्रयोग व आयोजन कभी नहीं देखा| स्वयं उनका जीवनवृत हायरसेकेण्डरी करते ही सरस्वती शिशुमंदिर का प्राचार्य होना, फिर प्रधानाचार्य हो जाना रहा। कालांतर वे विद्याभारती की बालसाहित्य पत्रिका देवपुत्र पत्रिका के संपादक रहे। देवपुत्र पत्रिका ने अपनी प्रसार संख्या का 3 लाख, 71 हज़ार प्रतिमाह कर विश्वकीर्तिमान स्थापित किया था| पराग व नंदन बालपत्रिकाओं का स्तम्भ ढह जाने पर चिंता व्यक्त करते हुए ऐसे बालसाहित्य की आयोजन की आवश्यकता बताई| बच्चों को क्या पसंद है? इसका निर्धारण अभिभावक नहीं, बच्चे करें| अपने जीवनकाल में सात से आठ लाख बच्चों से सीधा संवाद करने वाले डॉ दवे ने कहा कि कॉमिक्स आदि में जो महापुरुष बताये गए हैँ वे वास्तव में काल्पनिक हैँ| वे आदर्श हो ही नहीं सकते| वीर शिवाजी, वीर सावरकर जैसे महापुरुष के आदर्शो को हम अंगीकार करें और अपने जीवन की लड़ाई कर सकें| अपने मेवाड़ की रक्षा करने वाले हल्दीघाटी में वीरता प्रदर्शन करने वाले महाराणा प्रताप अस्सी किलो का भाला उठाते थे, वे बच्चों के आदर्श होने चाहिये| चाचा चौधरी और साबू जैसे काल्पनिक पात्र नहीं| बच्चों को वामपंथ और पाश्चात्य प्रभाव से बचाकर ऐतिहासिक शौर्यताओं से अवगत कराएं| और आज वे साहित्य अकादमी के निर्देशक बनकर नहीं बल्कि सरस्वती शिशुमंदिर के आचार्य बनकर आये हैँ और अपनी पूर्ववर्ती आचार्य श्रीमती उमादेवी पाराशर को प्रणाम करने आये हैँ|
सभा -प्रारम्भ से उद्यापन आद्योपांत संचालिका गीतिका वेदिका ने आभार ज्ञापित करते हुए ‘बालसभा’ के आगामी आयोजन की घोषणा की समर्पयामि फाउण्डेशन की अध्यक्ष गीतिका वेदिका ने कहा कि आभार-ज्ञापन का पाथेय न केवल आपके पुनरागमान का संकेत है बल्कि इस भव्य पारिवारिक और सांस्कृतिक साहित्यिक यज्ञ में मेरे द्वारा ज्ञान-अज्ञान में हुयी त्रुटियों का क्षमायाचना पत्र भी है।

