टीकमगढ़ । आज के आधुनिक युग में भी अहोई अष्टमी का महत्व कम नहीं हुआ है। शहरों और व्यस्त जीवनशैली के बावजूद महिलाएँ इस दिन उपवास रखती हैं,भारतीय संस्कृति में व्रत और त्योहार केवल पूजा-पाठ के माध्यम नहीं हैं, बल्कि यह जीवन के आदर्शों, भावनाओं और संबंधों की गहराई को दर्शाते हैं। इन्हीं में से एक है अहोई अष्टमी व्रत, जो मातृत्व की भावना से जुड़ा एक अत्यंत पवित्र पर्व है। यह व्रत माताएँ अपने बच्चों की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना के लिए रखती हैं। यह पर्व माँ के त्याग, स्नेह और श्रद्धा का अद्भुत प्रतीक है।कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को अहोई अष्टमी का व्रत किया जाता है। यह पर्व करवा चौथ के ठीक चार दिन बाद और दीपावली से सात दिन पहले आता है।
अहोई अष्टमी व्रत का उद्देश्य संतान की दीर्घायु, सुख और सुरक्षा के लिए माँ द्वारा किया गया एक निस्वार्थ संकल्प है। इस दिन माताएँ निर्जला उपवास रखती हैं और रात्रि में तारा दर्शन के बाद ही व्रत खोलती हैं। यह व्रत नारी के समर्पण और आस्था की मिसाल है। प्राचीन समय में इसे केवल पुत्र की लंबी आयु के लिए रखा जाता था, परंतु अब यह सभी बच्चों,पुत्र-पुत्री दोनों के कल्याण हेतु किया जाता है। अहोई अष्टमी के दिन प्रातःकाल स्नान के बाद माताएँ संकल्प लेती हैं कि वे दिनभर व्रत रखकर अपने बच्चों की मंगलकामना करेंगी। इस दिन निर्जला उपवास रखना श्रेष्ठ माना गया है, परंतु कुछ महिलाएँ फलाहार कर सकती हैं। शाम के समय पूजा की तैयारी की जाती है। दीवार पर या कागज पर अहोई माता का चित्र बनाया जाता है। चित्र में अहोई माता, साही माता और सात पुत्रों के प्रतीकात्मक चित्र होते हैं। साथ में सात तारे या बिंदु बनाए जाते हैं, जो सात संतान या सात पीढ़ियों का प्रतीक माने जाते हैं। संध्या के समय जब तारा उदय होने लगता है, तब दीप जलाकर माता अहोई की पूजा की जाती है। माताएँ आकाश में तारे को देखती हैं, उसे जल अर्पित करती हैं और उसी क्षण व्रत खोलती हैं। अहोई शब्द का अर्थ ही है अहो यानी गलती और ई यानी क्षमा। अहोई माता वह देवी हैं जो अनजाने में हुए पापों को क्षमा करती हैं और अपने भक्तों के जीवन से संकट दूर करती हैं। अहोई अष्टमी का व्रत केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि यह समाज में स्त्री की भूमिका, उसकी संवेदनशीलता और त्याग को उजागर करता है। यह पर्व मातृत्व के उस रूप को सामने लाता है, जो न केवल सृजन करती है बल्कि संरक्षण भी करती है। इस व्रत में माँ यह संकल्प लेती है कि वह अपने बच्चों की रक्षा और उन्नति के लिए हर तप, हर त्याग करने को तैयार है। यही भावना भारतीय संस्कृति में नारी को पूजनीय बनाती है।अहोई अष्टमी का एक पर्यावरणीय संदेश भी है। कथा में वर्णित साही एक वन्य जीव है, जो भूमि और जंगल की उर्वरता में सहायक होता है। इस कथा के माध्यम से यह संदेश मिलता है कि प्रकृति और जीवों के प्रति दया और करुणा रखना मानव का धर्म है। अनजाने में भी किसी जीव को कष्ट देना पाप माना गया है। इस दृष्टि से अहोई अष्टमी केवल संतान की पूजा नहीं, बल्कि जीवों के प्रति करुणा और प्रकृति के प्रति सम्मान का भी पर्व है।अहोई अष्टमी जीवन के उस भाव को भी अभिव्यक्त करती है जिसमें गलती करने के बाद पश्चाताप और सुधार का मार्ग खुला रहता है। यह पर्व हमें सिखाता है कि यदि किसी ने अनजाने में कोई भूल कर दी हो, तो सच्चे मन से पश्चाताप और ईश्वर की प्रार्थना करने से क्षमा प्राप्त की जा सकती है। यह क्षमा की भावना समाज को मानवीय और संवेदनशील बनाती है।अंततः अहोई अष्टमी भारतीय नारी की उस शक्ति को नमन है जो सृजन करती है, पोषण करती है और रक्षा भी करती है। यह पर्व मातृत्व की पवित्रता का उत्सव है। जिस समाज में माँ का आदर किया जाता है, वहाँ सदैव शुभता और समृद्धि बनी रहती है। अहोई अष्टमी की यह परंपरा हमें याद दिलाती है कि माँ केवल जननी नहीं, बल्कि एक देवी स्वरूप है जिसकी ममता से ही संसार चलता है।वर्ष 2025 में अहोई अष्टमी 13 अक्टूबर, सोमवार को मनाई गई। अहोई माता का आशीर्वाद सभी संतानों पर बना रहे। सभी माताओं को अहोई अष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ। प्रेस को यह तमाम जानकारी श्रीमती प्रियंका पवन घुवारा ने व्हाट्सएप के माध्यम से लिखित प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी है।
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