भारत में विजयादशमी (दशहरा) के दिन जहाँ एक ओर रावण के पुतले का दहन किया जाता है, वहीं देश के कुछ प्रमुख स्थानों पर रावण के प्रकांड विद्वान, महाज्ञानी और शिवभक्त होने के कारण उनकी पूजा-अर्चना की जाती है।
इटारसीI यहाँ उन प्रमुख स्थानों की सूची और कुणाल पासवान की ओर से तैयार की गई एक विशेष समाचार रिपोर्ट दी जा रही है।भारत में जहाँ रावण की पूजा की जाती है (प्रमुख स्थल) मंदसौर (मध्य प्रदेश): मंदसौर को रावण की पत्नी मंदोदरी का मायका माना जाता है। यहाँ के लोग रावण को अपने क्षेत्र का “जमाई” (पाहुना) मानते हैं और खानपुरा क्षेत्र में स्थापित रावण की मूर्ति की पूजा करते हैं। बिसरख (ग्रेटर नोएडा, उत्तर प्रदेश): मान्यता है कि बिसरख रावण का जन्मस्थान है। यहाँ रावण को महान ब्राह्मण और शिवभक्त माना जाता है, इसलिए विजयादशमी पर पुतला जलाने के बजाय यज्ञ और पूजा की जाती है। दशानन मंदिर, शिवाला (कानपुर, उत्तर प्रदेश): यहाँ स्थित दशानन मंदिर साल में सिर्फ एक बार दशहरे के दिन ही खुलता है। लोग रावण के ज्ञान और शक्ति के दर्शन-पूजन के लिए यहाँ पहुँचते हैं। रावणग्राम, विदिशा (मध्य प्रदेश): विदिशा जिले के इस गाँव में रावण की एक विशाल प्रतिमा स्थापित है, जहाँ ग्रामीण किसी भी शुभ कार्य से पहले और दशहरे पर रावण की विशेष पूजा करते हैं। जोधपुर और मंदौर (राजस्थान): श्रीमाली ब्राह्मणों (दवे गोधा समाज) के लोग स्वयं को रावण का वंशज मानते हैं। दशहरे के दिन यहाँ रावण दहन देखने के बजाय शोक और तर्पण की परंपरा निभाई जाती है। बैजनाथ (काँगड़ा, हिमाचल प्रदेश): मान्यता है कि रावण ने यहाँ भगवान शिव की घोर तपस्या की थी। शिवभक्ति के प्रति सम्मान जताने के लिए यहाँ दशहरे पर रावण का पुतला नहीं जलाया जाता। गढ़चिरौली (महाराष्ट्र): यहाँ गोंड आदिवासी समुदाय के लोग रावण और उनके पुत्र मेघनाद को अपना आराध्य मानकर उनकी पूजा करते हैं। कोलार एवं मंड्या (कर्नाटक): यहाँ फसल उत्सव और धार्मिक आयोजनों के दौरान रावण की शिवभक्ति का स्मरण करते हुए उसकी बहुभुज प्रतिमा की पूजा की जाती है।
विशेष समाचार :
दशहरे पर जहाँ जलता नहीं, पूजा जाता है लंकापति रावण—विजयादशमी का पर्व पूरे भारत में अधर्म पर धर्म की विजय और श्री राम द्वारा रावण वध के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। देश भर में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के ऊँचे-ऊँचे पुतले बनाकर जलाए जाते हैं। लेकिन भारत की समृद्ध और विविध सांस्कृतिक परंपराओं के बीच कुछ ऐसे अनूठे स्थान भी हैं जहाँ दशहरे के दिन रावण का पुतला दहन नहीं होता, बल्कि उसकी भव्य आरती और पूजा-अर्चना की जाती है। पत्रकार कुणाल पासवान की इस विशेष ग्राउंड रिपोर्ट के अनुसार, रावण को केवल एक पौराणिक पात्र के रूप में ही नहीं, बल्कि चारों वेदों के ज्ञाता, प्रकांड पंडित और भगवान भोलेनाथ के परम भक्त के रूप में भी देखा जाता है। दामाद और पूर्वज के रूप में सम्मान मध्य प्रदेश के मंदसौर में स्थानीय निवासी रावण को अपना दामाद मानते हैं। मान्यता है कि रावण की पत्नी मंदोदरी मंदसौर की ही रहने वाली थीं। यहाँ रावण की विशाल मूर्ति के सामने महिलाएँ घूँघट कर के निकलती हैं और दशहरे पर विशेष पूजा की जाती है। वहीं राजस्थान के जोधपुर में श्रीमाली समाज के लोग खुद को रावण का वंशज मानकर दशहरे के दिन शोक व्यक्त करते हैं और उसकी आत्मा की शांति के लिए अनुष्ठान करते हैं। साल में केवल एक बार खुलता है यह मंदिर उत्तर प्रदेश के कानपुर स्थित दशानन मंदिर की अपनी एक अनोखी कहानी है। यह मंदिर वर्ष में केवल एक बार — विजयादशमी की सुबह — ही श्रद्धालुओं के लिए खोला जाता है। यहाँ रावण के ज्ञानी स्वरूप और शिवभक्ति की आराधना की जाती है और शाम को मंदिर के कपाट पुनः एक वर्ष के लिए बंद कर दिए जाते हैं। इसी प्रकार ग्रेटर नोएडा के बिसरख गाँव को रावण का जन्म स्थान मानकर यहाँ कभी पुतला नहीं जलाया जाता। हिमाचल प्रदेश के बैजनाथ में रावण की कठिन तपस्या के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए स्थानीय लोग दशहरे का जश्न पारंपरिक रूप से अलग ढंग से मनाते हैं।
निष्कर्ष भारतीय संस्कृति की यही सबसे बड़ी सुंदरता है कि-
यहाँ विचारों और मान्यताओं का सम्मान किया जाता है। जहाँ एक तरफ श्रीराम के आदर्शों का जश्न मनाया जाता है, वहीं दूसरी तरफ रावण के प्रकांड ज्ञान और अटूट शिवभक्ति को भी नमन किया जाता है।
— पत्रकार कुणाल पासवान की रिपोर्ट

