“दामन”
कि आज ये धरा, किसी विधवा की भांति
अपनी टूटी हुई चुड़ियों को देख सोचती हैं
कि ये माथे पे सची बिंदिया विधाता ने नही,
अपितु इस वक्त मे मौजूद, कुछ स्वार्थी जनों ने तोड़ दी।
क्या मेरे दामन में,सिमेटे, पेड़ – पौधों
चलती, मदमस्त पवन इन्हें नही सुहाती
लगता हैं, मेरी ऐसी हालत देख इन्हें लज्जा नही आती।
मेरी आंखों से बहते अश्रु बेवजह नही ,
मुझे कुरेदा गया भीतर तक,
मेरे एक छोटे से घाव को नासूर बनाया हैं ।
दूसरो ने नही, अपनो ने मुझे अहसास दिलाया
मैं हूं मूकबधिर अपाहिज शायद
मेरी कराहती आवाज भी, किसी के कानों में नही जाती।
मेरे बूढ़े मित्र पीपल की टहनियां भी झूकने लगी हैं,
आज झूलों की रस्सीयां भी कमजोर हो चली हैं
महक माटी की,कुर्बान कर दी भविष्य की दौड़ में।
खट्टी मीठी इमलियां भी टूट कर, गिरने लगी
अब हवा के संग रेत, स्वाद में मिलने लगी
क्या कहे आज तमाशा बन गई हैं जिंदगी मेरी।
थी, धूप छांव से यारी मेरी बरसो पुरानी
आज धुंध सुबह की, भी आंख को भांति नही
कुछ अवशेष पुराने, चित्र स्मृति पटल पर
बस अब मिटने को हैं।
नीरज चौधरी नीर

