विधानसभा में गूँजी इटारसी के साहित्य की चमक: “विधायिका और मीडिया” का भव्य विमोचन I
इटारसी/भोपाल: मध्य प्रदेश विधानसभा का परिसर हाल ही में एक गौरवशाली साहित्यिक उपलब्धि का साक्षी बना। विधानसभा अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह तोमर ने इटारसी के वरिष्ठ लेखक एवं प्रखर विचारक मिलिन्द रोंघे की नवीन कृति “विधायिका और मीडिया” का विमोचन किया। यह पुस्तक न केवल एक लेखक की उपलब्धि है, बल्कि संसदीय लोकतंत्र को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण दस्तावेज भी है।
लोकतंत्र के सेतु पर संवाद
यह कृति लोकतंत्र के दो अपरिहार्य अंगों—विधायिका और मीडिया—के आपसी संबंधों, उनकी मर्यादाओं और संसदीय कार्यप्रणाली की सूक्ष्मताओं पर केंद्रित है। विमोचन के दौरान सदन का वातावरण बौद्धिक चर्चाओं से सराबोर रहा।
दिग्गजों की उपस्थिति
कार्यक्रम में राजनीति और प्रशासन की शीर्ष हस्तियों ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज कराई:
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डॉ. सीतासरन शर्मा (पूर्व विधानसभा अध्यक्ष एवं मार्गदर्शक)
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अरुण भीमावत (विधायक)
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अरविंद शर्मा (प्रमुख सचिव, मध्य प्रदेश विधानसभा)
इसके अतिरिक्त, इटारसी और नर्मदापुरम क्षेत्र के प्रबुद्ध जनों ने भी कार्यक्रम में सहभागिता की, जिनमें जनपद पंचायत अध्यक्ष भूपेन्द्र चौकसे, जगदीश मालवीय, राहुल चौरे, शिरिष कोठारी, अधिवक्ता विनोद चौहान, भूपेन्द्र विश्वकर्मा, आदित्य रिछारिया और शुभम् शर्मा प्रमुख थे।
‘विधायिनी’ से पुस्तक तक का सफर
लेखक मिलिन्द रोंघे ने पुस्तक की पृष्ठभूमि साझा करते हुए बताया कि यह कृति विधानसभा की प्रतिष्ठित शोध पत्रिका ‘विधायिनी’ में समय-समय पर प्रकाशित उनके शोध लेखों का एक सुव्यवस्थित संकलन है।
क्यों खास है यह पुस्तक?
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संसदीय ज्ञान का भंडार: इसमें विधायी प्रक्रियाओं और सदन की गरिमा को अक्षुण्ण रखने वाले विषयों का समावेश है।
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युवाओं के लिए मार्गदर्शिका: राजनीति विज्ञान के विद्यार्थियों और शोधार्थियों के लिए यह एक अनिवार्य अकादमिक संदर्भ सामग्री सिद्ध होगी।
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मीडिया का महत्व: यह स्पष्ट करती है कि किस प्रकार एक सजग मीडिया संसदीय लोकतंत्र को अधिक पारदर्शी और सशक्त बना सकता है।
अध्यक्षीय संबोधन
विधानसभा अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह तोमर ने लेखक मिलिन्द रोंघे की लेखनी की सराहना करते हुए कहा कि संसदीय परंपराओं को जन-सामान्य तक पहुँचाने के लिए ऐसा साहित्य अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने इसे इटारसी और पूरे प्रदेश के बौद्धिक जगत के लिए एक गौरवमयी क्षण बताया।
॥ आज का विचार ॥
“शब्दों में वह शक्ति होती है जो समाज को दिशा दे सकती है, और जब ये शब्द लोकतंत्र के स्तंभों को परिभाषित करें, तो वे राष्ट्र निर्माण का आधार बन जाते हैं।”
पत्रकार-कुणाल पासवान
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