टीकमगढ़ । प. पू. गणाचार्य श्री 108 विराग सागर जी महामुनिराज के 64 वें अवतरण दिवस के अवसर पर श्री आदिनाथ धाम, नदींश्वर कालोनी टीकमगढ़ में मुनि श्री विकौशल सागर जी मुनिराज के सानिध्य में हो रहे 2 दिवसीय कार्यक्रम में आज प्रथम दिवस का कार्यक्रम अत्यन्त भव्यता के साथ सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर प्रातः 6.30 बजे से भगवान का अभिषेक एवं मुनि श्री के मुखाविन्द से शांतिधारा सम्पन्न हुई तदुपरान्त पाठशाला की दीदीयों के द्वारा भक्ति नृत्य के रूप में मंगलाचरण सम्पन्न किया गया। चित्र अनावरण उपस्थित विदृत वर्ग एवं आदिनाथ धाम समिति के सदस्यों द्वारा किया गया। मंगल दीप प्रज्जवलन का सौभाग्य उपस्थित विभिन्न महिला मंडल की महिलाओं को प्राप्त हुआ। इन सभी कार्यों के सम्पन्न होने पर भगवान की पूजन के उपरान्त परमपूज्य गणाचार्य श्री 108 विराग सागर जी महामुनिराज की संगीतमय पूजन की गई जिसमें विभिन्न महिला मंडलों के द्वारा सजाकर लाए गए अष्ट अलग-25 समूहों के द्वारा समर्पित किये गए। इनमें पाठशाला के बच्चों में उपस्थिति श्रेष्ठी वर्ग का, विधानकताओं पाठशाला की दीदीओ तथा 4 अलग-अलग महिला मंडलों के समूह को जल, चंदन आदि 8 द्रव्यों में से एक-एक द्रव्य का सजा हुआ धाल संगीतमय पूजन में समर्पित करने का सोभाग्य मिला। पूजन के अंत में एक साथ जयमाला पूर्वक सभी ने पूणोघ समर्पित किया इसके साथ ही भक्तामर विधान का भी आयोजन किया गया तथा मुनि श्री के मंगल प्रवचनों का भीनाभ उपस्थित लोगों ने लिया। मुनि श्री ने प. पू. आचार्य विराग सागर जी के जीवन पर प्रकाश डालते हुए बताया कि मात्र 16 वर्ष की आयु में क्षुल्लक दीक्षा ग्रहण कर ली तथा साधना एवं अध्ययन में संलग्न रहे आचार्य श्री का जन्म 2 मई 1963 को मध्य प्रदेश के दमोह जिले के पथरिया नामक ग्राम में हुआ। आपक पिता श्री कपूर चंद जी एवं माता श्यामा देरी थे आपने क्षुल्लक अवस्था में ही उन्हें तपेदिक (टी.बी.) का रोग हो जाने पर डाक्टरों द्वारा अंग्रेजी दवाई खाने का सुझाव दिया गया गया परन्तु उन्होंने अपने वैराग्य को दृढ रखते हुए प्रतिज्ञा की कि यदि वें स्वस्थ हो गए तो मुनि दीक्षा घारण
करेंगे अन्यथा सल्लेखना समाधि को अंगीकार करेंगे लेकिन अपने नियमों में दोष नहीं लगाएंगे। नियम के प्रभाव से आप 6 माह में ही पूर्णतः स्वस्थ हो गए अत: अपने नियमानुसार आपने परम पूज्य आचार्य विमल सागर जी के करकमलो से मुनि दीक्षा ग्रहण की। आपके लिए लगभग 10 आचार्यों द्वारा आचार्य पद देने का प्रयास होने पर भी आपने इसे स्वीकार नहीं किया फिर प. पू. आचार्य विमल सागर जी के आदेशानुसार दौणगिरी में 1992 में जबरदस्ती आचाये पर सौंपा गया। आज अ आज आपके लगभग 550 शिष्य एवं प्रशिष्य देशभर में जैनधर्म की प्रभावना कर रहे हैं। आपने अनेक पंचकल्याणक एवं तीर्थ क्षेत्रों का जीर्णोद्वार कराया। संस्कृत, प्राकृत एवं हिन्दी में अनेक रचनाएं लिखी तथा युग प्रतिक्रमण एवं यति सम्मेलन जैसी प्राचीन पद्धतियों को पुर्नजीवित किया। इस प्रकार जहाँ आपने जैन धर्म के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया वहीं आपने अहिंसा, व्यसन मुक्ति दर्शन शाकाहार, बेटी बचाओ बेटी पढाओ एवं स्वच्छता अभियान में लगभग 40 लाख लोगों को जोड़कर तथा तथा अनेक विद्यालयों जेलों, न्यायालयों एवं सार्वजनिक स्थानों पर प्रवचन देकर जैनेतर समाज का भी उद्धार किया तथा जीवन के अंत में श्रेष्ठ समाधि साधना द्वारा जीवन को सार्थक एवं सफल किया कार्यक्रम में मूर्धन्य विद्वान वर्धमान सौरया, प्रवीण शास्त्री, राजेश शास्त्री श्रेष्ठी, संजीव बजाज (कुमकुम) आदिनाथ धाम समिति, पाठशाला के बच्चे एवं महिला मंडलों सहित समस्त समाज की गरिमामय उपस्थिति रहीं
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