टीकमगढ़। शहर की उर्दू अदब की प्रमुख संस्था बज़्में अदब की 273वीं माहाना नशिस्त शकील खान के दौलत कदे में आयोजित की गई। संस्था के मीडिया प्रभारी राजीव नामदेव ‘राना लिधौरी’ द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, इस बार नशिस्त की सदारत कर्वी (चित्रकूट) से पधारे मशहूर शायर हाजी सैयद अख्तर साहब ने की।
कार्यक्रम में माह का मिसरा-ए-तरह “तसव्वुर ने तिरी तस्वीर हर जानिब सजा दी है” दिया गया, जिस पर शायरों ने शानदार अंदाज़ में अपने-अपने कलाम पेश किए।
हाजी सैयद अख्तर ने अपनी ग़ज़ल में कहा— “मुसलसल कर रहे हो तुम छुपाने की जिसे कोशिश,
तुम्हारी आँखों ने वो बात पहले ही बता दी है।”
इकबाल फ़ज़ा ने पढ़ा— “समंदर ने मेरी कश्ती किनारे पर लगा दी है,
न जाने किसने साहिल से मिरे हक में दुआ दी है।”
राजीव नामदेव ‘राना लिधौरी’ ने कहा— “जरा सी उसने ताकत अपनी दुनिया को दिखा दी है,
के दुश्मन आ गया है फर्श पर ऐसी सज़ा दी है।”
वफ़ा शैंदा ने अपने अशआर में दर्द बयां किया— “बहुत रोते हैं वो, आँसू भी रोके से नहीं रुकते,
हमारी दास्तान-ए-ग़म उन्हें किसने सुना दी है।”
खालिद वेग ने वतनपरस्ती पर कहा— “उन्हें खालिद बताओ कैसे फिर हम भूल पाएंगे,
वतन के वास्ते जिस जिसने जान अपनी लुटा दी है।”
शकील खान ने पढ़ा— “तुम्हारी याद हमने इस तरह दिल से भुला दी है,
ग़ज़ल जैसे किसी ने रेत पर लिखकर मिटा दी है।”
अनवर खान साहिल ने कहा— “तुम्हारी बज़्म ने सच बोलने की ये सज़ा दी है,
ज़रा सी झोपड़ी थी गाँव में, वो भी जला दी है।”
सलीम खान ने शेर सुनाया— “चलो आओ ऐ दीवानों, ऐ परवानों चले आओ,
किसी ने शाम से पहले यहाँ शमां जला दी है।”
इसके अलावा कारी मोहम्मद अखलाक, जाबिर गुल और पूरनचंद्र गुप्ता ने भी अपने कलाम प्रस्तुत किए। नशिस्त की निज़ामत अनवर खान साहिल ने की, जबकि अंत में कारी मोहम्मद अखलाक ने सभी का आभार व्यक्त किया।
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